ठेकेदारी और आर्थिक लाभ का भी चल रहा है खेल
फर्रुखाबाद। सियासत में एक-दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की प्रथा काफी पुरानी चली आ रही है।एक-दूसरे को नीचा दिखाने का भी कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया जाता है। ऐसे में व्यापार मंडल के विभिन्न संगठनों व पदाधिकारियों को सामने रखकर राजनैतिक रोटियां सेकी जा रही हैं। इसके साथ-साथ जो जितना अच्छा विरोध करेगा, उसको इनाम स्वरूप कुछ न कुछ काम दिया जायेगा। काम न दे पाए तो दूसरे माध्यमों से लाभ पहुंचाया जाता है। इन दिनों सदर क्षेत्र में सह-मात का खेल कापते तेजी से चल रहा है।
उल्लेखनीय है कि नगर क्षेत्र का रेलवे रोड राजनीति का अखाड़ा बन गया है। दो वर्ष पहले अतिक्रमण हटाओ के नाम पर तत्कालीन नगर मजिस्ट्रेट दीपाली भार्गव, अधिशासी अधिकारी रविन्द्र कुमार के नेतृत्व में तोड़-फोड़ हुई थी। त्रिपोलिया चौक पर टाइम सेंटर को गिराने के साथ साथ रेलवे स्टेशन तिराहे तक अतिक्रमण को बहाया गया था।वाद-विवाद के साथ-साथ कानूनी कार्यवाही का भी हंटर चला था। इस पूरे प्रकरण में कोई भी सत्ताधारी खुलकर सामने नहीं आया। दुकानदारों को उनके सहारे पर छोड़ दिया गया था। अब जब अतिक्रमण हटाओ अभियान समाप्त हो चुका है तब सौंदर्याकरण को लेकर नए-नए पैतरे चले जा रहे हैं। व्यापारियों को इंतजार है कि सही मानक से रोड का निर्माण हो। उनकी दुकानदारी सही तरीके से चलने लगे, इसी के चलते आए दिन अधिशासी अधिकारी विनोद कुमार से कोई न कोई बातचीत अवश्य होती है। पालिकाध्यक्ष के पति व पूर्व एमएलसी मनोज अग्रवाल भी दुकानदारों की सहायता के लिए प्रयासरत रहते हैं। इस बार देखा गया है कि विभिन्न मांगों को लेकर किए गए वायदों का पूरा न होने पर व्यापारिक संगठन कई धड़ों में बटे दिखाई दिए। इसके पीछे के कई कारण चर्चा में हैं। कुछ का कहना है कि व्यापार मंडल कितना भी संगठित व मजबूत क्यों न हो, प्रशासनिक हंटर से बचने के लिए सत्ताधारियों का विरोध मोल नहीं लिया जा सकता है। इस बार देखा गया है कि पुरूष व्यापारी नेताओं की तुलना में महिला पदाधिकारियों को आगे करके आंदोलन को धार देने का प्रयास किया गया है। यह सब अकारण ही नहीं बल्कि पर्दे के पीछे हो रहे खेल का नतीजा है। कुछ व्यापारी नेता तो रात के अंधेरे में अपने दिग्गज नेता से सलाह-मशविरा करके अपनी बात रखते हैं, वहीं कुछ व्यापारियों के हित में अपना पक्ष रखते हैं। आखिरकार किससे किससे विरोध लिया जाए और दुकानदारों के हित में काम किया जाए। नाम तो सौंदर्यीकरण का है लेकिन राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए पैतरे चले जा रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है कि सत्ताधारी दिग्गज नेता के पुतले को त्रिपोलिया चौक पर आग के हवाले किए जाने के बाद इसमें शामिल कुछ लोगों को दूसरे दिग्गज सत्ताधारी नेता ने सहारा दिया। दूसरे क्षेत्र में ठेका देकर काम के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी दिया गया। लोग समझते हैं कि इस तरह की पैतरेबाजी की जानकारी किसी को नहीं होगी लेकिन राजनैतिक गलियारों में कुछ भी छिपता नहीं है। दिग्गज नेता विरोध के कारण बनी खायी को भरने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि साथ रहकर इस खायी को और गहरा करने के लिए विरोधियों को हवा दे रहे हैं। यह एक तरफसे नहीं होता है, बल्कि अन्य दिग्गजों की तरफसे भी मौके का फायदा उठाया जाता है, फिलहाल यह सब आगे होने वाले चुनाव की तैयारियों के रूप में हो रहा है। अपना पक्ष मजबूत करने के लिए दूसरे की कमियों को उजागर करने का भी अभियान चल रहा है। फिलहाल अन्य लोग इस पूरे मामले को बड़े ही चारीकी से देख रहे हैं और पड़ताल करके साक्ष्यों को एकत्र करने का प्रयास कर रहे हैं। हॉ इतना जरूर है कि जो अब विरोध का दंश झेल रहे हैं ।वे स्वयं विरोधी बनाने में आगे रहते हैं। राजनीति में यह कहावत भी चरितार्थ होती रहती है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, यह पैतरेबाजी अभी से नहीं बल्कि नगर पालिका चुनाव से चल रही है जो लोकसभा चुनाव में भी बदस्तूर जारी रही। अब एक बार फिर से आगामी विधानसभा व लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगी, ऐसा समझा जा रहा है।

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