मैनपुरी: उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी सत्ता, संगठन और कारोबार के रिश्तों की चर्चा होती है, तो राज कॉरपोरेशन लिमिटेड (RCL) का नाम अपने-आप सामने आ जाता है। मैनपुरी से जुड़ी इस कंपनी के मुख्य संचालक मनोज यादव को राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) का करीबी बताया जाता रहा है, हालांकि सत्ता बदलने के दौरान उन्होंने दिखावे के लिए भाजपा का झंडा जरूर थाम रखा है। सियासी चर्चाओं में यहां तक कहा जाता है कि सपा सरकार के दौरान इस कंपनी का प्रभाव दिन-रात बढ़ता चला गया। जो आज देश की जानी-मानी कंस्ट्रक्शन कंपनी में शुमार है, और इस कंपनी का टर्नओवर भी लाखों करोड़ में जिस पर आयकर और ईडी किसी की भी हाथ डालने की हिम्मत नहीं है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, समाजवादी पार्टी शासनकाल में राज कॉरपोरेशन लिमिटेड को कई अहम निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में अवसर मिले थे, जिनमे खूब मनमानी के दौर रहे। इसी दौर में कंपनी ने सड़क, भवन और बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्यों में अपनी पकड़ मजबूत की। विपक्ष उस समय से ही यह सवाल उठाता रहा है कि क्या यह बढ़त केवल काम की गुणवत्ता का नतीजा थी, या इसके पीछे सत्ता के करीबी रिश्ते भी भूमिका में थे।
सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ जब सत्ता परिवर्तन के बाद भी कंपनी की गतिविधियां और आर्थिक मजबूती बरकरार दिखी। सियासी हलकों में यह चर्चा तेज है कि सरकार बदली, लेकिन राज कॉरपोरेशन लिमिटेड की स्थिति कमजोर नहीं हुई। यही वजह है कि आज इसे उत्तर प्रदेश की अग्रणी कंस्ट्रक्शन कंपनियों में गिना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक कंपनी का नहीं, बल्कि राजनीति और कारोबार के रिश्तों का प्रतीक बन गया है।पक्ष का तर्क है कि कंपनी की सफलता उसके प्रबंधन, तकनीकी क्षमता और समय पर काम पूरा करने की वजह से है। विपक्ष सवाल उठाता है कि सपा शासनकाल में जिस तेजी से कंपनी आगे बढ़ी, वह क्या सामान्य थी, या सत्ता के संरक्षण का परिणाम?
फिलहाल ये तमाम बातें राजनीतिक चर्चाओं और आरोप-प्रत्यारोप के दायरे में हैं। किसी भी तरह की आधिकारिक जांच या निर्णय के बिना इन्हें निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। लेकिन इतना तय है कि राज कॉरपोरेशन लिमिटेड का नाम आज उत्तर प्रदेश की राजनीति और कंस्ट्रक्शन सेक्टर दोनों में बहस का विषय बना हुआ है।
अब बड़ा सवाल यही है क्या यह कंपनी सचमुच केवल अपने काम के दम पर आगे बढ़ी? या फिर सत्ता के नजदीकी रिश्तों ने इसे वह बढ़त दी, जो आम कंपनियों को नहीं मिल पाती? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में नए सियासी विमर्श को जन्म दे सकते हैं।


