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Thursday, February 19, 2026

रेल किराया बढ़ा, सवाल वही पुराना—सुविधा पहले या बोझ बाद में?

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शरद कटियार

भारतीय रेल (Indian Railways) देश की जीवनरेखा कही जाती है। यह केवल परिवहन (transportation) का साधन नहीं, बल्कि आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का अभिन्न हिस्सा है। ऐसे में जब भारतीय रेलवे लंबी दूरी की यात्रा पर किराया बढ़ाने का फैसला करती है, तो यह स्वाभाविक है कि उस पर बहस हो।

रेलवे ने घोषणा की है कि 26 दिसंबर 2025 से 215 किलोमीटर से अधिक की यात्रा करने वाले यात्रियों को प्रति किलोमीटर 1 से 2 पैसे अतिरिक्त चुकाने होंगे। रेलवे का तर्क है कि इससे उसे सालाना लगभग 600 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होगी, जिसका उपयोग सुविधाओं के विस्तार और सेवाओं में सुधार के लिए किया जाएगा।

एक तरफ यह राहत की बात है कि 215 किलोमीटर से कम दूरी तय करने वाले यात्रियों और मंथली सीजन टिकट धारकों पर इस बढ़ोतरी का कोई असर नहीं पड़ेगा। इससे दैनिक यात्रियों, छात्रों और नौकरीपेशा वर्ग को सीधी राहत मिली है। लेकिन दूसरी ओर, लंबी दूरी की यात्रा करने वाला मध्यम वर्ग और प्रवासी मजदूर इस फैसले से प्रभावित होगा—भले ही बढ़ोतरी नाममात्र की क्यों न हो।

छोटी बढ़ोतरी, बड़ा असर

रेलवे यह कह सकता है कि 1–2 पैसे प्रति किलोमीटर की बढ़ोतरी कोई बड़ा बोझ नहीं है, लेकिन जब यही बढ़ोतरी हजारों किलोमीटर की यात्रा में जुड़ती है, तो टिकट का कुल मूल्य महसूस कराने लगता है। खासकर उन यात्रियों के लिए, जो त्योहारों, रोजगार या इलाज के लिए लंबी दूरी तय करने को मजबूर हैं।

सवाल सुविधाओं का है

सबसे अहम सवाल यही है—
क्या किराया बढ़ाने के साथ सुविधाएं भी उसी गति से बढ़ेंगी?
यात्री आज भी कई रूटों पर
भीड़भाड़
लेट ट्रेनों
साफ-सफाई की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। यदि किराए में बढ़ोतरी का पैसा वास्तव में ट्रैक सुधार, कोचों की संख्या बढ़ाने, स्वच्छता और सुरक्षा पर खर्च होता है, तो जनता इसे सहजता से स्वीकार भी कर सकती है।

सरकार और रेलवे के लिए यह ज़रूरी है कि आय बढ़ाने और जनसरोकार के बीच संतुलन बनाए रखें। रेलवे मुनाफे की संस्था नहीं, बल्कि सामाजिक सेवा का माध्यम भी है। हर फैसला इस सोच के साथ होना चाहिए कि रेल आम आदमी की पहुंच से बाहर न जाए।

किराया बढ़ाना प्रशासनिक रूप से आसान फैसला हो सकता है, लेकिन उसे जनता के विश्वास से जोड़ना उतना ही जरूरी है। यदि रेलवे पारदर्शिता के साथ यह बताए कि अतिरिक्त 600 करोड़ रुपये कहां और कैसे खर्च होंगे, तो यात्रियों का भरोसा मजबूत होगा। वरना डर यही है कि किराया तो बढ़े, लेकिन सवाल और शिकायतें जस की तस बनी रहें।

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