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गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजेंद्र एवं विज्ञान संस्थान के निदेशक तथा देश के प्रख्यात न्यूरोसर्जन प्रोफेसर राजकुमार के ओजस्वी भाषण का केंद्रबिंदु यदि कोई था, तो वह थे डॉ. भीमराव अंबेडकर। उनका पूरा वक्तव्य बाबासाहेब के विचारों, उनके राष्ट्रवाद, उनके त्याग और उनके द्वारा निर्मित संविधान की आत्मा के इर्द-गिर्द घूमता रहा। यह भाषण केवल श्रद्धांजलि नहीं था, बल्कि उस ऐतिहासिक सत्य की पुनः स्थापना थी कि आधुनिक भारत की वैचारिक नींव बाबासाहेब अंबेडकर के चिंतन और संघर्ष से ही मजबूत हुई है।
बाबासाहेब: केवल संविधान निर्माता नहीं, राष्ट्र निर्माता
प्रोफेसर राजकुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बाबासाहेब को केवल “संविधान निर्माता” कह देना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना है। वे उससे कहीं अधिक थे—वे एक राष्ट्र निर्माता, दूरदर्शी चिंतक, समाज सुधारक और अखंड भारत के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने कहा कि यह समझना बेहद ज़रूरी है कि बाबासाहेब का राष्ट्रवाद भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि तर्क, न्याय और समावेशन पर आधारित राष्ट्रवाद था।
13 दिसंबर 1946 और बाबासाहेब की ऐतिहासिक उपस्थिति
अपने भाषण में प्रोफेसर राजकुमार ने इतिहास की उस निर्णायक तारीख—13 दिसंबर 1946—पर विशेष जोर दिया, जब संविधान सभा की पहली बैठक हुई। उन्होंने बताया कि इसी पहली बैठक में मुस्लिम लीग की ओर से बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर संविधान सभा के सदस्य के रूप में उपस्थित थे। यह तथ्य अपने-आप में बाबासाहेब के कद को दर्शाता है।
उस समय जब देश विभाजन की ओर बढ़ रहा था, जब अलगाववादी सोच हावी थी, बाबासाहेब ने संविधान सभा में बैठकर अखंड भारत के लिए संविधान के माध्यम से लड़ाई लड़ी। प्रोफेसर राजकुमार ने कहा—“यह कोई छोटी बात नहीं है कि मुस्लिम लीग से जुड़े होने के बावजूद बाबासाहेब ने भारत को बाँटने की नहीं, बल्कि भारत को जोड़ने की राजनीति की।”
मुस्लिम लीग, विभाजन और बाबासाहेब की राष्ट्रवादी दृष्टि
प्रोफेसर राजकुमार ने इस मिथक को भी तोड़ा कि बाबासाहेब किसी एक समुदाय या राजनीतिक धारा तक सीमित थे। उन्होंने बताया कि जब मुस्लिम लीग संविधान सभा की बैठकों का बहिष्कार कर रही थी, तब भी बाबासाहेब लगातार यह समझाने का प्रयास कर रहे थे कि शक्ति और विवेक का संतुलन ही किसी भी समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।
उन्होंने कहा कि बाबासाहेब ने स्पष्ट रूप से माना था कि यदि भारत को मजबूत बनाना है तो उसे धर्म, जाति और संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठना होगा। यही कारण है कि उन्होंने विभाजन की पीड़ा के बीच भी संविधान को ऐसा रूप दिया, जो आने वाली पीढ़ियों को जोड़ने का काम करे।
“फादर ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन” – नाम नहीं, तपस्या
प्रोफेसर राजकुमार ने कहा कि बाबासाहेब को यूँ ही “फादर ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन” नहीं कहा जाता। यह उपाधि उन्हें उनकी अथक मेहनत, असाधारण विद्वता और अद्वितीय त्याग के कारण मिली।
उन्होंने बताया कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया लगभग 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन चली। इस दौरान हजारों संशोधनों पर चर्चा हुई, सैकड़ों बैठकों में भाग लिया गया, और हर पंक्ति पर गंभीर मंथन हुआ। इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में बाबासाहेब थे—दिन-रात संविधान के प्रारूप को गढ़ते हुए।
प्रोफेसर राजकुमार ने बाबासाहेब के पहले संविधान सभा भाषण का विस्तृत उल्लेख किया और बताया कि उसमें उन्होंने आने वाले भारत के लिए स्पष्ट दिशा तय कर दी थी। बाबासाहेब ने पाँच बुनियादी बातों पर विशेष बल दिया—
निरपेक्ष शासन (सेक्युलर स्टेट)
बाबासाहेब का स्पष्ट मत था कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा। राज्य सभी धर्मों से समान दूरी रखेगा, ताकि किसी भी नागरिक के साथ अन्याय न हो।
मौलिक अधिकारों की गारंटी
उन्होंने कहा था कि राजनीतिक आज़ादी तब तक अधूरी है, जब तक नागरिक स्वतंत्रता और समानता सुनिश्चित न हो।
आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय
बाबासाहेब ने आर्थिक विकास को संविधान का प्रमुख एजेंडा बताया। उनका मानना था कि भूखा और बेरोज़गार नागरिक लोकतंत्र को मजबूत नहीं कर सकता।
एकत्व की राह
उन्होंने कहा था—चाहे कोई मुस्लिम लीग का हो, लेबर पार्टी का, जनसंघ का, जैन, बौद्ध या वैष्णव—सबको राष्ट्रहित में एकत्व की राह पर चलना होगा।
संघीय ढांचा
केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन बनाए बिना भारत जैसे विविध देश को नहीं चलाया जा सकता—यह बाबासाहेब की दूरदृष्टि थी।
प्रोफेसर राजकुमार ने बाबासाहेब के उस कथन को विशेष रूप से रेखांकित किया जिसमें उन्होंने कहा था—“वह दिन देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा, जब पार्टी और व्यक्ति राष्ट्र से ऊपर हो जाएँगे।”
उन्होंने कहा कि बाबासाहेब ने पहले ही आगाह कर दिया था कि यदि स्थानीय स्वार्थ, जातीय राजनीति या दलगत हित राष्ट्रीय हित पर हावी हुए, तो संविधान केवल कागज़ का दस्तावेज़ बनकर रह जाएगा।
प्रोफेसर राजकुमार ने बाबासाहेब के इस विचार को विस्तार से समझाया कि संविधान कोई पत्थर की लकीर नहीं है। बाबासाहेब ने स्वयं कहा था कि संविधान तब तक सफल रहेगा, जब तक उसमें समय के अनुसार बदलाव होते रहेंगे।
लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा था कि बदलाव तभी सार्थक होंगे, जब उन्हें लागू करने वाले लोग ईमानदार, सत्यनिष्ठ और राष्ट्रवादी होंगे।
अपने भाषण के समापन की ओर बढ़ते हुए प्रोफेसर राजकुमार ने कहा कि आज जब कुछ लोग देश को बाँटने वाली भाषा बोल रहे हैं, तब बाबासाहेब को पढ़ना और समझना पहले से कहीं अधिक ज़रूरी हो गया है।
अखंड भारत किसी नारे से नहीं, बल्कि संविधान, समानता और न्याय से बनता है—और यह रास्ता बाबासाहेब ने हमें दिखाया।
गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर प्रोफेसर राजकुमार का वक्तव्य वस्तुतः भारत रत्न बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर को नमन था। यह भाषण याद दिलाता है कि हमारा संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं, बल्कि करोड़ों बलिदानों, संघर्षों और सपनों का दस्तावेज़ है।
बाबासाहेब अंबेडकर का राष्ट्रवाद आज भी हमें सिखाता है कि सच्चा राष्ट्रवाद दूसरों को बाहर करने से नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने से जन्म लेता है। यही भारत का गणतंत्र है, यही संविधान की आत्मा है।

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