यूथ इंडिया
देश में पत्रकारिता (journalism) आज एक कठिन दौर से गुजर रही है। एक ओर पारंपरिक मीडिया (traditional media) पर राजनीतिक, प्रशासनिक और कॉरपोरेट दबाव बढ़ता जा रहा है, तो दूसरी ओर सोशल मीडिया बिना किसी नियंत्रण के सूचना और अफवाहों का सबसे बड़ा मंच बन चुका है। इस टकराव ने सच और झूठ की सीमा को धुंधला कर दिया है।
पारंपरिक पत्रकारिता जहां तथ्य, पुष्टि और जवाबदेही के सिद्धांतों पर आधारित होती है, वहीं सोशल मीडिया पर खबरें बिना जांच-पड़ताल के वायरल हो जाती हैं। कई मामलों में फर्जी खबरें, आधी-अधूरी जानकारी और भावनात्मक पोस्ट जनमत को प्रभावित कर रही हैं। इसका सीधा असर लोकतांत्रिक विमर्श पर पड़ रहा है।
पत्रकारों का कहना है कि सत्ता से सवाल पूछने पर नोटिस, मुकदमे, दबाव और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। वहीं सोशल मीडिया पर सक्रिय कई अकाउंट बिना किसी जिम्मेदारी के खबरें फैलाते हैं और जवाबदेही से बच निकलते हैं। इससे पेशेवर पत्रकारिता कमजोर होती जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में बड़ी संख्या में लोग अब समाचार के लिए सोशल मीडिया पर निर्भर हो गए हैं। लेकिन समस्या यह है कि यहां न तो संपादक है, न तथ्य जांच की प्रक्रिया। नतीजतन, झूठी खबरें सच से ज्यादा तेजी से फैल जाती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। जब पत्रकारिता दबाव में हो और सोशल मीडिया पर भ्रम हावी हो, तो आम नागरिक के लिए सही जानकारी तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
स्वतंत्र पत्रकारिता की सुरक्षा,
मीडिया पर दबाव खत्म करने की,
और सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी तय करने की।
कुल मिलाकर, आज की लड़ाई केवल मीडिया बनाम सोशल मीडिया की नहीं है, बल्कि यह सच बनाम भ्रम की लड़ाई है। अगर पत्रकारिता कमजोर पड़ी, तो लोकतंत्र की आवाज भी कमजोर हो जाएगी।


