भारत में लोकतंत्र की नींव उसकी ग्राम पंचायतों में निहित है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राज्य में पंचायत चुनाव केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सामाजिक और प्रशासनिक उत्सव होते हैं। वर्ष 2025 में प्रस्तावित पंचायत चुनावों को लेकर उत्तर प्रदेश शासन ने जो प्राथमिक तैयारियाँ आरंभ की हैं, वे न केवल तकनीकी दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि इनके सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ भी व्यापक हैं। शासन द्वारा पंचायत चुनावों के पूर्व ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन और परिसीमन की प्रक्रिया आरंभ करना इस दिशा में पहला सशक्त कदम माना जा सकता है।
वर्ष 2021 में सम्पन्न हुए पिछले पंचायत चुनावों के बाद से प्रदेश में शहरीकरण की प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ी है। कई परंपरागत ग्राम पंचायतों को नगर निकायों—नगर पालिकाओं, नगर पंचायतों और नगर निगमों—में सम्मिलित कर दिया गया। वहीं, नई आर्थिक और भौगोलिक आवश्यकताओं के मद्देनज़र राज्य सरकार ने अनेक नए राजस्व ग्रामों का सृजन भी किया। यह प्रक्रिया जहाँ एक ओर विकास की ओर संकेत करती है, वहीं पंचायत चुनावों की दृष्टि से यह चुनौतीपूर्ण भी बनती है।
अब जब ये ग्राम शहरी निकायों का हिस्सा बन चुके हैं, तो उनकी पुरानी ग्राम पंचायत की संरचना निष्प्रभावी हो गई है। आंकड़ों के अनुसार लगभग 1000 ऐसे गांव हैं जो नगर निकायों में शामिल हो चुके हैं, और करीब 1000 नए राजस्व ग्रामों का निर्माण भी हुआ है। इन सबको ध्यान में रखते हुए पंचायत क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण आवश्यक हो गया है। यह न केवल पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित करेगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि कोई भी नागरिक मतदान और प्रतिनिधित्व के अधिकार से वंचित न रह जाए।
शासन द्वारा 5 जून तक जिलों से प्रस्ताव मांगे गए हैं, ताकि नगर निकायों में सम्मिलित ग्राम पंचायतों और नए राजस्व ग्रामों की स्थिति स्पष्ट की जा सके। इसी के आधार पर चार सदस्यीय समिति पंचायतों के पुनर्गठन और परिसीमन की दिशा में कार्य करेगी। यह समिति केवल तकनीकी दस्तावेजों पर निर्भर नहीं रहेगी, बल्कि यह जनभागीदारी को भी प्राथमिकता दे सकती है, यदि इच्छाशक्ति हो।
शासन ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस समय किसी भी नगर निकाय की सीमा का विस्तार नहीं किया जाएगा और न ही नई नगर पंचायतों का गठन होगा। यह निर्णय अत्यंत समयानुकूल और विवेकपूर्ण है। यदि चुनाव प्रक्रिया के ठीक पहले सीमा विस्तार जैसी कवायद की जाती, तो यह न केवल प्रशासनिक भ्रम पैदा करती, बल्कि चुनाव की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती।
जैसे-जैसे पंचायतों का पुनर्गठन होगा, वैसे-वैसे सीटों की संख्या, आरक्षण की स्थिति और चुनाव चिह्नों के निर्धारण की प्रक्रिया भी शुरू होगी। यह अत्यंत संवेदनशील और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण नीति की पारदर्शिता और निष्पक्षता सर्वोपरि होगी। दलित, पिछड़ा वर्ग, महिला और आदिवासी समुदायों के लिए निर्धारित आरक्षण यदि ठीक प्रकार से लागू नहीं किया गया तो इसका असर व्यापक असंतोष के रूप में सामने आ सकता है।
इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि पंचायत चुनाव समय से कराए जाएँ। यह केवल संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पुनरावृत्ति की अनिवार्यता भी है। पंचायतों का कार्यकाल वर्ष 2026 में समाप्त होगा, लेकिन यदि परिसीमन प्रक्रिया और अन्य तैयारी समय पर पूरी न हुई, तो संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है। शासन द्वारा दिसंबर 2024 तक परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने का लक्ष्य रखा जाना एक स्वागतयोग्य कदम है।
पंचायत चुनाव केवल सत्ता हस्तांतरण का माध्यम नहीं होते, बल्कि ये सामाजिक संरचना और नेतृत्व विकास की सबसे पहली सीढ़ी होते हैं। यही वह मंच होता है जहाँ से आम ग्रामीण नागरिक सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है। इसलिए परिसीमन, पुनर्गठन और आरक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है।
यदि परिसीमन में किसी खास वर्ग को प्रतिनिधित्व से वंचित कर दिया जाए, या किसी खास समुदाय की आबादी को नज़रंदाज़ किया जाए, तो इससे सामाजिक असंतुलन उत्पन्न होगा। कई बार राजनीतिक लाभ के लिए भी सीमाओं का निर्धारण इस प्रकार किया जाता है जिससे सत्ताधारी दल को लाभ हो, जिसे ‘गैर-बराबरी की पुनर्रचना’ कहा जा सकता है। ऐसी स्थितियों से बचना शासन की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
राज्य निर्वाचन आयोग की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में केन्द्रीय है। चुनाव आयोग को स्वतंत्र, निष्पक्ष और निष्कलंक छवि के साथ कार्य करना होगा। समिति का गठन इस दिशा में पहला प्रयास है, लेकिन इसे केवल प्रशासनिक समिति न समझा जाए, बल्कि इसे समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी अपने कार्य को अंजाम देना चाहिए। ग्राम पंचायत केवल भूगोल की इकाई नहीं होती, वह समाजशास्त्रीय, जातीय, सांस्कृतिक और राजनीतिक इकाई भी होती है।
इसके अतिरिक्त डिजिटल माध्यमों का अधिकतम उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि आम जन भी परिसीमन की प्रक्रिया में भाग ले सकें। सार्वजनिक नोटिस, ग्राम सभाओं में चर्चा और ऑनलाइन आपत्तियाँ आमंत्रित कर इस प्रक्रिया को अधिक लोकतांत्रिक बनाया जा सकता है।
इस बार शासन और चुनाव आयोग को यह अवसर मिल रहा है कि वे पंचायत चुनाव प्रणाली में कुछ नवाचार करें। जैसे—पोलिंग बूथों का डिजिटलीकरण, मोबाइल ऐप के माध्यम से नामांकन प्रक्रिया, पारदर्शी मतदान प्रक्रिया और मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन। पंचायत चुनावों में कई बार मतदाता जागरूकता की कमी होती है, और उम्मीदवारों का चयन जातिगत समीकरणों पर आधारित होता है। यदि शासन और आयोग मिलकर एक प्रभावी जनजागरूकता अभियान चलाएँ, तो पंचायत चुनावों की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है।
वर्ष 2025 का पंचायत चुनाव केवल एक चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के ग्रामीण परिदृश्य का पुनर्निर्माण होगा। यह लोकतंत्र के उस सबसे बुनियादी स्तर को सशक्त करने का माध्यम बनेगा जहाँ से नेतृत्व की यात्रा शुरू होती है। परिसीमन की प्रक्रिया, यदि निष्पक्ष, पारदर्शी और भागीदारी आधारित रही, तो यह लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत करेगी।
अब यह शासन और निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि वे इस संकल्पना को यथार्थ में बदलें—बिना किसी राजनीतिक दबाव, सामाजिक पूर्वाग्रह या प्रशासनिक ढिलाई के। तभी यह कहा जा सकेगा कि पंचायत चुनाव वास्तव में “जनता के लिए, जनता के द्वारा और जनता के माध्यम से” संपन्न हो रहे हैं।


