गृहस्थ जीवन में कर्म ही पूजा है

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— संत प्रेमानन्द के विचारों पर विशेष लेख
भरत चतुर्वेदी
भारतीय अध्यात्म की परंपरा सदियों से यह संदेश देती आई है कि ईश्वर तक पहुँचने के कई मार्ग हैं—भक्ति, ज्ञान, योग और कर्म। लेकिन संत प्रेमानन्द का सरल और गहरा संदेश इस जटिलता को एक पंक्ति में बांध देता है:
“गृहस्ती में ज्यादा पूजा की जरूरत नहीं है, तुम जो कार्य कर रहे हो वो भगवान की पूजा है।”
यह विचार केवल एक आध्यात्मिक उपदेश नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन में दिशा देने वाला वह प्रकाशस्तंभ है, जिसकी आज के समय में पहले से ज्यादा जरूरत है।
गृहस्थ जीवन को अक्सर लोग सिर्फ जिम्मेदारियों, कामकाज और पारिवारिक दायित्वों के रूप में देखते हैं।
लेकिन भारतीय दर्शन में गृहस्थाश्रम को जीवन का मूल केंद्र माना गया है, क्योंकि यहीं से समाज, संस्कृति और मूल्य आगे बढ़ते हैं।
संत प्रेमानन्द का कहना है कि रोज़मर्रा में किया गया हर नेक कार्य, परिवार का पालन-पोषण, ईमानदारी से कमाया गया धन, किसी की मदद करना—ये सब ईश्वर उपासना के समकक्ष हैं।
आज के व्यस्त जीवन में हर व्यक्ति मंदिर, पूजा या लंबी साधना के लिए समय नहीं निकाल पाता।
लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि वह ईश्वर से दूर है?
संत प्रेमानन्द के अनुसार—नहीं।
जब कोई व्यक्ति अपने कार्य को ईमानदारी से करता है,
जब वह परिवार की जरूरतों के लिए श्रम करता है,
जब वह समाज में अपना कर्तव्य निभाता है,
तो वही उसके लिए ईश-सेवा बन जाता है।
यह विचार कर्मयोग पर आधारित है—वह मार्ग जिसे श्रीकृष्ण ने भी सर्वोत्तम बताया।
कई लोग पूजा-पाठ करके भी चिंता में रहते हैं, जबकि कर्मयोग का पालन करने वाले साधारण गृहस्थ भी शांत दिखाई देते हैं।
क्योंकि पूजा बाहरी साधना है,
लेकिन कर्म—आंतरिक शुचिता का प्रमाण है।
यदि नीयत पवित्र है,
यदि काम सही है,
यदि मन साफ़ है—
तो वही पूजा है।
संत प्रेमानन्द का संदेश क्यों महत्वपूर्ण है?
आज के समय में पूजा-पाठ अक्सर प्रदर्शन का रूप ले लेती है।
संत प्रेमानन्द याद दिलाते हैं कि भगवान बाहरी दिखावा नहीं,
मन की सच्चाई देखते हैं।
किसान, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी—हर कोई अपने कार्य के माध्यम से ईश-सेवा कर सकता है।
यह भक्ति का लोकतांत्रिक स्वरूप है।
परिवार, समाज, और राष्ट्र सभी मजबूत तभी होंगे जब हर व्यक्ति अपने कर्तव्य को पूजा मानकर पूरा करे।
जब किसी को यह एहसास हो जाता है कि उसका रोज़ का कार्य भी आध्यात्मिक है,
तो अपराधबोध, तनाव और दबाव कम हो जाते हैं।
संत प्रेमानन्द का संदेश यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर किसी एक स्थान या विधि में सीमित नहीं हैं।
वे वहीं हैं—जहाँ श्रम, प्रेम और सच्चाई है।
माता-पिता का सम्मान करना,
नैतिकता से धन कमाना,
किसी की सहायता करना—
ये सब चुपचाप की गई पूजा है, जिसका फल मन की शांति के रूप में मिलता है।
संत प्रेमानन्द का संदेश आधुनिक गृहस्थ के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
जीवन की भागदौड़ में पूजा-पाठ के लिए समय निकालना जरूरी हो सकता है,
लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है ईमानदारी, कर्तव्य और मानवीयता।
कर्म ही पूजा है—
यही संदेश घर-घर पहुँचाने की आवश्यकता है, ताकि जीवन केवल भौतिक न रह जाए, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा से भी भर सके।

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