प्रशासन और राजनीतिक गलियारों में चर्चित तीन घटनाओं का सच सामने आया

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लखनऊ| प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में आज तीन किस्से चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। ये किस्से अपने आप में समाज और सिस्टम की असलियत को उजागर करते हैं और यह बताते हैं कि कैसे कभी-कभी सिस्टम की खामियां और नीतिगत चुप्पी बड़े स्तर पर असर डालती हैं।पहला मामला एक सेहत से जुड़े शिक्षालय का है, जहां डॉक्टरी पढ़ाई के बजाय छात्रों को वसूली का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस टीम के प्रशिक्षकों का तरीका इतना सख्त और दबंग है कि अगर कोई छात्र उनकी मनमानी के मुताबिक परिणाम नहीं देता या प्रशिक्षण लेने से मना करता है, तो उसकी क्लास ही नहीं लगाई जाती और उसे शिक्षालय से बाहर करने की धमकी दी जाती है। हैरानी की बात यह है कि शिक्षालय के मुखिया को सारी घटनाओं की जानकारी है, फिर भी वे चुप हैं। इस चुप्पी को मौन स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है, जो छात्रों और शिक्षण व्यवस्था दोनों के लिए चिंता का विषय बन चुका है।दूसरी घटना प्रदेश की राजधानी के पास एक औद्योगिक शहर में हुई। यहां एक बड़े जुटान में विश्वविद्यालय के पूर्व, वर्तमान और भावी कुलपति तथा कई शिक्षक शामिल थे। ठंड के मौसम में कॉफी का इंतजार करते हुए एक शिक्षक ने अपने तंज के माध्यम से अपने विश्वविद्यालय की व्यवस्थाओं पर व्यंग्य किया। उन्होंने कहा कि ‘कॉफी का कप न हो गया, कुलपति हो गया है’। यह टिप्पणी वहां मौजूद सभी लोगों के बीच हंसी का कारण बनी, लेकिन यह प्रशासनिक व्यवस्थाओं और विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल भी खड़े करती है।तीसरी कहानी नशे के कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले अफसरों और उनके पीछे छुपे खेल की है। मामले के मुख्य किरदारों में से एक बाहुबली का बगलगीर, जो पहले खाकीवाले के खिलाफ आरोपी था, अब खुलेआम घूम रहा है। जांच अधिकारियों को उसकी मौजूदगी का पता नहीं चल पा रहा है, जबकि उसे शरण देने वालों से पूछताछ तक नहीं की जा रही। यह दर्शाता है कि कई बार कानून और सिस्टम अपने तय उद्देश्यों को सही तरीके से लागू नहीं कर पाते और संरक्षण तथा छुपाव की राजनीति कानून के ऊपर हावी हो जाती है।
ये तीन किस्से न केवल प्रशासन और शिक्षा के क्षेत्र की वास्तविकता को उजागर करते हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि सिस्टम में मौजूद खामियों और चुप्पी का किस तरह फायदा उठाया जा रहा है। समाज के लिए यह चेतावनी है कि सिर्फ कानूनी प्रावधान ही नहीं, बल्कि उनकी सही निगरानी और पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है।

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