– दूसरी पार्टियों के ईशारे पर कठपुतली की तरह सदैव किया काम
– यूपी में कांग्रेस हित में कभी नहीं किसी मुद्दे पर उठाई आवाज

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लगातार सिमटते राजनीतिक आधार पर जब भी चर्चा होती है, तो एक नाम बार-बार सामने आता है “प्रमोद तिवारी” यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि क्या पार्टी का यह पतन केवल हालात की देन है, या फिर नेतृत्व की उन रणनीतियों का नतीजा, जिनका केंद्र व्यक्तिगत सीट-सुरक्षा रहा?
सत्ता नहीं, सीट-सुरक्षा प्राथमिकता
प्रमोद तिवारी दशकों से उत्तर प्रदेश की राजनीति में मौजूद रहे हैं। इस लंबे दौर में उन्होंने अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक जमीन तो संभाली, लेकिन प्रदेश में कांग्रेस संगठन का विस्तार, सामाजिक गठजोड़ और नई पीढ़ी का नेतृत्व—इन मोर्चों पर ठोस परिणाम नहीं दिखे। पार्टी की रणनीति अक्सर बयान-आधारित राजनीति तक सीमित रही, जबकि जमीनी संगठन कमजोर होता चला गया।
आरोप यह है कि अलग-अलग दलों के प्रभावशाली नेताओं के लिए अनुकूल बयान देकर अपने तत्काल राजनीतिक हित साधे गए। इससे क्षणिक व्यक्तिगत लाभ तो मिला, लेकिन कांग्रेस की पहचान—एक वैकल्पिक, संगठित विपक्ष कमजोर होती गई। नतीजा यह रहा कि पार्टी नीतिगत नेतृत्व के बजाय टिप्पणी-प्रधान दिखने लगी।
लोकसभा/विधानसभा ट्रेंड में पिछले तीन आम चुनाव चक्रों में यूपी में कांग्रेस का मत-प्रतिशत लगातार गिरा, सीटें एकल अंक तक सिमटीं।
संगठनात्मक विस्तार: जिला-स्तर पर सक्रिय कमेटियों और बूथ-मैनेजमेंट में गिरावट दर्ज हुई; कई क्षेत्रों में स्थायी नेतृत्व का अभाव रहा।सामाजिक आधार: पर ब्राह्मण-दलित-ओबीसी के स्थायी गठजोड़ पर काम न हो सका; नए मतदाताओं में पार्टी की रिकॉल वैल्यू घटी।
(ये आँकड़े चुनावी रुझानों और सार्वजनिक चुनाव परिणामों के समेकित अध्ययन पर आधारित हैं।)
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि लंबे समय तक नेतृत्व में रहते हुए भी अपने सामाजिक समूह में नई राजनीतिक पीढ़ी तैयार नहीं हुई। नतीजतन, पार्टी का प्रभाव व्यक्ति-केंद्रित रह गया, समुदाय-केंद्रित नहीं बन पाया।
यूपी में कांग्रेस “गड्ढे” में कैसे गई
स्थानीय नेतृत्व का अवमूल्यन: जिलों में उभरते नेताओं को मंच/निर्णय-भूमिका नहीं मिली।
रणनीतिक अस्पष्टता के बीच गठबंधन, मुद्दे और मैदान—तीनों पर स्पष्ट रोडमैप नहीं दिखा।जमीनी मुद्दों से दूरी रखी, बेरोजगारी, किसान-आय, कानून-व्यवस्था जैसे विषयों पर स्थायी अभियान नहीं बने।
प्रमोद तिवारी की राजनीति ने व्यक्तिगत निरंतरता तो दी, पर प्रदेश-व्यापी पुनरुत्थान नहीं। आज सवाल यह नहीं कि कौन कितने साल राजनीति में रहा, बल्कि यह है कि किसने पार्टी को आगे बढ़ाया। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का भविष्य तब ही बदलेगा, जब सीट-सुरक्षा से ऊपर संगठन-निर्माण और बयान से ऊपर ज़मीनी काम को प्राथमिकता दी जाएगी।

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