वाशिंगटन: संयुक्त राज्य अमेरिका में इन दिनों प्रस्तावित ‘सेव एक्ट’ को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार इस कानून को लागू करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। इस प्रस्तावित कानून के तहत मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने के लिए नागरिकता का प्रमाण देना अनिवार्य किया जाएगा।
यह कानून ‘सेफगार्ड अमेरिकन वोटर एलिजिबिलिटी एक्ट’ यानी सेव एक्ट के नाम से जाना जा रहा है। इसके प्रावधानों की तुलना भारत में अपनाई जाने वाली एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया से की जा रही है, जिसमें मतदाता सूची की सत्यता की जांच की जाती है।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाना है। सरकार का दावा है कि इससे केवल वैध अमेरिकी नागरिक ही मतदान कर सकेंगे और चुनावी व्यवस्था में विश्वास मजबूत होगा।
हालांकि इस कानून को लेकर देश के भीतर तीखी राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। विपक्षी दल और कई सामाजिक संगठन इसे मतदाता अधिकारों पर हमला बता रहे हैं और कह रहे हैं कि इससे लाखों लोग मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं।
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अमेरिका की चुनावी प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक संगठित और सख्त बनाया जाना चाहिए। फिलहाल अमेरिकी चुनाव व्यवस्था संघीय प्रणाली पर आधारित है, जिसमें हर राज्य को अपने नियमों के अनुसार चुनाव कराने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
हालांकि अमेरिकी संविधान के तहत कांग्रेस को चुनाव नियमों में बदलाव करने का अधिकार भी दिया गया है। इसी प्रावधान के आधार पर ट्रंप प्रशासन चुनावी प्रक्रिया में व्यापक बदलाव करने की कोशिश कर रहा है।
प्रस्तावित कानून के तहत मतदाता पंजीकरण के लिए नागरिकता का प्रमाण देना अनिवार्य होगा। इसके लिए लोगों को वैध अमेरिकी पासपोर्ट, अपडेट ड्राइविंग लाइसेंस, जन्म प्रमाण पत्र या किसी अन्य सरकारी फोटो पहचान पत्र जैसे दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे।
इसके अलावा नए नियमों के अनुसार मतदाता पंजीकरण अब केवल ऑनलाइन या ईमेल के जरिए नहीं किया जा सकेगा। लोगों को व्यक्तिगत रूप से चुनाव अधिकारियों के कार्यालय में जाकर अपने दस्तावेजों के साथ पंजीकरण कराना होगा।
कानून के प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि अमेरिका के सभी राज्यों को अपने मतदाताओं की सूची संघीय सुरक्षा विभाग को भेजनी होगी। इसके बाद विभाग अपने डेटाबेस के साथ इन सूचियों का मिलान करेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मतदाता वास्तव में अमेरिकी नागरिक हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो इससे अमेरिका की चुनावी प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक केंद्रीकृत हो जाएगी। अभी तक कई फैसले राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
गौरतलब है कि यह विधेयक फरवरी में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित हो चुका है और अब इसे जल्द ही सीनेट में पेश किया जा सकता है। वर्तमान समय में सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत प्राप्त है।
सीनेट में रिपब्लिकन के पास 53 सीटें हैं, जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 47 सीटें हैं। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि कुछ रिपब्लिकन सांसद भी इस विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर असहमत बताए जा रहे हैं।
विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने इस कानून का खुलकर विरोध किया है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि वे इसे सीनेट में पारित नहीं होने देंगे और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ बताया है।
मतदान अधिकार से जुड़े कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज संगठनों का भी कहना है कि इस तरह का कठोर दस्तावेजीकरण लाखों मतदाताओं को मतदान से वंचित कर सकता है। उनका तर्क है कि कई लोगों के पास जन्म प्रमाण पत्र या पासपोर्ट जैसे दस्तावेज नहीं होते।
कुछ सर्वेक्षणों में भी यह सामने आया है कि हर दस मतदाताओं में से एक मतदाता के पास ऐसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो सकते, जो नागरिकता का प्रमाण देने के लिए जरूरी होंगे। इससे विशेष रूप से गरीब और अल्पसंख्यक समुदाय प्रभावित हो सकते हैं।
दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रंप का आरोप है कि विपक्षी दल गैर-नागरिकों को मतदान का अवसर देकर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि सेव एक्ट का उद्देश्य इस तरह की संभावनाओं को समाप्त करना है।
ट्रंप और उनके समर्थकों का मानना है कि इस कानून के लागू होने से अमेरिकी चुनाव प्रणाली अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बनेगी। उनका दावा है कि इससे भविष्य में चुनावी विवादों को भी कम किया जा सकेगा।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सेव एक्ट को लेकर आने वाले समय में अमेरिका की राजनीति में और तीखी बहस देखने को मिल सकती है। यह मुद्दा आगामी चुनावों में भी प्रमुख राजनीतिक विषय बन सकता है।


