ढाका। बांग्लादेश में आम चुनाव के बाद सियासी तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी बीच हिरासत में मौतों की घटनाओं ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के एक और वरिष्ठ नेता की न्यायिक हिरासत के दौरान मौत हो गई, जिससे राजनीतिक माहौल और गरमा गया है।
ताजा घटना में 60 वर्षीय शमीकुल इस्लाम, जो पलाशबाड़ी उपजिला में आवामी लीग के अध्यक्ष थे, की गाइबांधा जिला जेल में तबीयत बिगड़ने के बाद मौत हो गई। जेल प्रशासन के अनुसार उन्हें पहले स्थानीय सदर अस्पताल ले जाया गया और हालत गंभीर होने पर रंगपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया।
जेल अधीक्षक मोहम्मद अतीकुर रहमान ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा कि शमीकुल इस्लाम की तबीयत अचानक खराब हुई थी। चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की कोशिश की गई, किंतु उन्हें बचाया नहीं जा सका। प्रशासन का कहना है कि मौत बीमारी के कारण हुई, जबकि विपक्ष इसे संदिग्ध मान रहा है।
बताया जा रहा है कि 5 अगस्त 2024 को सत्ता परिवर्तन के बाद शमीकुल इस्लाम के खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए थे। 8 दिसंबर को उन्हें ढाका में एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। जमानत मिलने के बावजूद उन्हें एक अन्य प्रकरण में पुनः गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था।
इस घटना से पहले भी आवामी लीग के नेताओं की हिरासत में मौत के मामले सामने आ चुके हैं। हाल ही में पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता रमेश चंद्र सेन की दिनाजपुर जिला जेल में तबीयत बिगड़ने के बाद मृत्यु हो गई थी। वे जल संसाधन मंत्री रह चुके थे और ठाकुरगांव-1 सीट से सांसद भी रहे थे।
आवामी लीग ने इन घटनाओं को राजनीतिक प्रताड़ना करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया जा रहा है और जेलों का इस्तेमाल दबाव बनाने के साधन के रूप में किया जा रहा है। पार्टी नेताओं ने निष्पक्ष न्यायिक जांच की मांग की है।
इन घटनाओं के बीच अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल पर भी सवाल उठने लगे हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि हिरासत में मौतों की निष्पक्ष जांच कराना सरकार की जिम्मेदारी है ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों पर आंच न आए।
उधर, चुनाव में जीत हासिल करने के बाद बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान 17 फरवरी को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। ऐसे में नई सरकार के सामने कानून-व्यवस्था और राजनीतिक विश्वास बहाली की बड़ी चुनौती होगी।
मानवाधिकार संगठनों ने भी इन घटनाओं पर चिंता जताई है और हिरासत में बंद राजनीतिक नेताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि पारदर्शी जांच और जवाबदेही से ही लोकतंत्र मजबूत हो सकता है।
बांग्लादेश इस समय राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। एक ओर नई सरकार के गठन की तैयारियां हैं, तो दूसरी ओर हिरासत में मौतों के मामलों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में इन घटनाओं की जांच और नई सरकार की प्रतिक्रिया पर पूरे देश की नजरें टिकी रहेंगी।


