लखनऊ| कड़कड़ाती ठंड दस्तक दे चुकी है, लेकिन परिषदीय स्कूलों के करीब 10 लाख बच्चे आज भी बिना स्वेटर, बिना जूते-मोजे और बिना नई यूनिफार्म के स्कूल पहुंचने को मजबूर हैं। सरकार द्वारा दिए जाने वाले 1200 रुपये की डीबीटी महीनों से रुकी है और जमीनी हकीकत यह है कि विभाग के लगातार प्रयासों के बावजूद राहत बच्चों तक नहीं पहुंच पा रही है। सवाल यह है कि आखिर देरी की जिम्मेदारी किसकी है?
जांच में सामने आया है कि भुगतान में बाधा की सबसे बड़ी वजह अभिभावकों की अधूरी दस्तावेज़ी जानकारी है। बड़ी संख्या में अभिभावकों के आधार कार्ड तो बन गए हैं, लेकिन वे अभी तक बैंक खातों से लिंक नहीं हैं, जिसके कारण डीबीटी की प्रक्रिया बार-बार फेल हो रही है। दूसरी ओर कई अभिभावकों के आधार कार्ड ही नहीं बने हैं, जिससे बच्चों का डेटा आगे बढ़ नहीं पा रहा है और भुगतान पूरी तरह अटक गया है।
बेसिक शिक्षा विभाग अब इस समस्या को युद्धस्तर पर ठीक करने की कोशिश कर रहा है। बीआरसी स्तर पर शिविर लगाकर अभिभावकों को बुलाया जा रहा है, जहां आधार कार्ड बनवाने से लेकर बैंक लिंकिंग तक की प्रक्रिया तुरंत पूरी कराई जा रही है। स्कूलों के प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे घर-घर जाकर अभिभावकों से संपर्क करें और लंबित त्रुटियों को दूर करवाएं, ताकि कोई बच्चा सरकारी लाभ से वंचित न रह जाए।
बेसिक शिक्षा निदेशक प्रताप सिंह बघेल ने सभी जिलों के बीएसए को सख्त निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा है कि बच्चों के लंबित डेटा का सत्यापन तेजी से पूरा किया जाए और जिन अभिभावकों के खाते आधार से लिंक नहीं हैं, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर ठीक कराया जाए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ठंड के मौसम में कोई भी बच्चा बिना स्वेटर के स्कूल न पहुंचे और इसका कड़ाई से पालन कराया जाए।
विभाग का दावा है कि जैसे ही दस्तावेज़ों की खामियां दूर होंगी, डीबीटी राशि तुरंत खातों में भेज दी जाएगी। लेकिन जमीनी समस्या अभी भी जस की तस बनी हुई है। बच्चे स्वेटर के बिना ठिठुर रहे हैं, उपस्थिति पर असर पड़ रहा है और इंतजार बढ़ता जा रहा है।
अभिभावकों की लापरवाही, अधूरी जानकारी और आधार से जुड़ी गड़बड़ियों ने बच्चों के हक की यह महत्वपूर्ण राहत योजना मुश्किल में डाल दी है। योजनाएं कागज़ पर तैयार हैं, आदेश जारी हैं, शिविर भी लग रहे हैं—लेकिन जब तक आधार लिंकिंग पूरी नहीं होती, तब तक बच्चों के हाथ ठंड में कांपते ही रहेंगे।






