2027 की सियासी बिसात पर कुर्मी दांव: पंकज चौधरी के सहारे भाजपा की बड़ी रणनीति

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लखनऊ| कई महीने की मशक्कत और गहन मंथन के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक सोचा-समझा कदम उठाते हुए पूर्वांचल के कद्दावर नेता, सात बार के सांसद और केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। यह फैसला महज संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर पिछड़ा वर्ग, खासकर कुर्मी समाज को फिर से साधने और विपक्ष के पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) समीकरण में सेंध लगाने की बड़ी सियासी कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। इसके जरिए पार्टी ने अपने परंपरागत कुर्मी वोट बैंक को एकजुट रखने के साथ-साथ यह संदेश भी देने की कोशिश की है कि भाजपा अपने मूल काडर के नेताओं को नजरअंदाज नहीं करती।

दरअसल, यादवों के बाद पिछड़ा वर्ग में कुर्मी बिरादरी को लंबे समय तक भाजपा का मजबूत कोर वोट बैंक माना जाता रहा है। बावजूद इसके, 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने इस वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी कर दी। इसका सीधा असर भाजपा के प्रदर्शन पर पड़ा और 2019 में 62 सीटें जीतने वाली पार्टी 2024 में सिमटकर 36 सीटों पर रह गई। यही वह मोड़ था, जहां से पार्टी नेतृत्व ने नुकसान की भरपाई के लिए ऐसे चेहरे की तलाश शुरू की, जो कुर्मी समाज में भरोसा और प्रभाव दोनों रखता हो।

पार्टी के आंतरिक मंथन में यह बात सामने आई कि अपना दल (एस) की नेता अनुप्रिया पटेल जैसे बड़े कुर्मी चेहरे, करीब दो दर्जन कुर्मी विधायकों और संगठन में कई पटेल नेताओं के बावजूद कुर्मी वोट भाजपा से खिसक गया। मिर्जापुर संसदीय क्षेत्र के कुर्मी बहुल मड़िहान और चुनार विधानसभा क्षेत्रों में एनडीए को भारी नुकसान हुआ, जबकि वाराणसी में रोहनियां और सेवापुरी सहित अन्य विधानसभा क्षेत्रों में कुर्मी वोट घटने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत का अंतर भी कम हो गया। इसी तरह फूलपुर से सांसद प्रवीण पटेल अपनी ही विधानसभा सीट हार गए और प्रतापगढ़, प्रयागराज व कौशांबी जैसे जिलों में भी कुर्मी वोट बैंक ने भाजपा से दूरी बना ली।

इन सभी तथ्यों की समीक्षा के बाद पार्टी नेतृत्व इस नतीजे पर पहुंचा कि मौजूदा सियासी परिदृश्य में यूपी में मूल काडर के सिर्फ दो ही बड़े और प्रभावशाली कुर्मी चेहरे हैं—पंकज चौधरी और जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह। इनमें पंकज चौधरी की राजनीतिक यात्रा, चुनावी अनुभव और संगठनात्मक पकड़ उन्हें सबसे आगे खड़ा करती है। नौ बार लोकसभा चुनाव लड़कर सात बार जीत दर्ज करना, वह भी पार्टी के सत्ता में न होने के दौर में भी, उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। इसके साथ ही वे इस समय भाजपा में सबसे वरिष्ठ कुर्मी नेता भी हैं।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि इन तमाम कारणों को ध्यान में रखते हुए शीर्ष नेतृत्व ने पंकज चौधरी को प्रदेश संगठन का चेहरा बनाने का फैसला किया है। माना जा रहा है कि उनके नेतृत्व में भाजपा न सिर्फ कुर्मी समाज को फिर से अपने पाले में लाने की कोशिश करेगी, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़े वर्ग में अपनी सियासी पकड़ मजबूत कर विपक्ष की रणनीति को भी चुनौती देगी।

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