प्रशांत कटियार
लखनऊ। पंचायत चुनावों की संभावित आहट के साथ जिस राजनीतिक सरगर्मी ने गांव कस्बों को गर्मा दिया था, वह अब अचानक ठंडी पड़ती नजर आ रही है। चुनाव की तारीखों और आरक्षण की स्थिति को लेकर बनी अनिश्चितता ने दावेदारों की सक्रियता पर साफ ब्रेक लगा दिया है। जो चेहरे कुछ समय पहले तक खुलेआम खर्च करते, दावतें उड़ाते और हर सामाजिक कार्यक्रम में सेवा के नाम पर आगे आगे नजर आते थे, वे अब मुट्ठी बांधे चुपचाप हालात का जायजा लेते दिखाई दे रहे हैं।
कुछ ही सप्ताह पहले तक हालात बिल्कुल अलग थे। कहीं भोज का आयोजन हो रहा था, तो कहीं मांगलिक कार्यक्रमों, तेरहवीं और अन्य सामाजिक अवसरों पर संभावित प्रत्याशी बढ़ चढ़कर खर्च कर रहे थे। गांव की चौपाल से लेकर ब्लॉक मुख्यालय तक यह चर्चा आम थी कि कौन दावेदार कितना पानी की तरह पैसा बहा रहा है। लेकिन जैसे ही यह चर्चा जोर पकड़ने लगी कि पंचायत चुनाव समय पर होंगे या टल सकते हैं और आरक्षण का गणित क्या होगा, दावेदारों की रफ्तार अचानक धीमी पड़ गई।
ब्लॉक से लेकर जिला मुख्यालय और सत्ता के गलियारों तक फैली इस अनिश्चितता का सीधा असर जमीनी राजनीति पर दिखने लगा है। दावेदार अब यह जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं कि बिना तस्वीर साफ हुए खर्च जारी रखा जाए। कई संभावित प्रत्याशी मानते हैं कि अगर चुनाव टल गए या आरक्षण की श्रेणी बदल गई, तो अब तक किया गया खर्च बेकार चला जाएगा। इसी डर ने उन्हें फिलहाल ‘रुको और देखो’ की नीति अपनाने पर मजबूर कर दिया है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पंचायत चुनावों में खर्च का बड़ा हिस्सा शुरुआती माहौल बनाने में ही हो जाता है। ऐसे में तारीख और आरक्षण की घोषणा में देरी दावेदारों की रणनीति पूरी तरह बदल देती है। यही वजह है कि पहले जहां हर कार्यक्रम में दावेदारों की मौजूदगी और खर्च चर्चा का विषय होती थी, अब वहां सन्नाटा पसरा हुआ है।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर बनी असमंजस की स्थिति ने न केवल राजनीतिक माहौल को ठंडा किया है, बल्कि संभावित प्रत्याशियों की जेब और रणनीति दोनों पर लगाम कस दी है। अब सभी की निगाहें चुनाव आयोग और सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं तारीख और आरक्षण साफ होते ही माहौल फिर से गर्माएगा या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा।






