सामाजिक न्याय की लड़ाई में उग्र हुईं पटेल, सड़कों पर सत्ता से सीधा टकराव,दिखा रौद्र प्रतिरोध, पुलिस ने बाल पड़कर गाड़ी में डाला
लखनऊ (प्रशांत कटियार)|लखनऊ की सड़कों पर मंगलवार को जो दृश्य देखने को मिला, वह केवल एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि आरक्षित, दलित और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए खड़ी एक निर्भीक जननेत्री का साहसिक प्रतिरोध था। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग समानता विनियमन 2026 के समर्थन में अपना दल (कमेरावादी) की अध्यक्ष और सिराथू से विधायक पल्लवी पटेल जब सैकड़ों महिलाओं और कार्यकर्ताओं के साथ सूचना प्रौद्योगिकी चौराहे से विधानसभा तक पैदल मार्च निकाल रही थीं, तो सत्ता की बैरिकेडिंग और पुलिसिया बल भी उनके कदम नहीं रोक सका।
रिजर्व पुलिस लाइन के पास कंटीले अवरोधक लगाकर मार्च को रोका गया, लेकिन यह रोक केवल रास्ते की थी, विचारों की नहीं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जब पल्लवी पटेल ने शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ने की कोशिश की, तो पुलिस ने बल प्रयोग किया। इसके बाद सड़क पर बैठकर धरना देना यह साबित करता है कि पल्लवी पटेल सत्ता के दबाव में झुकने वाली नेता नहीं हैं, बल्कि जनता के अधिकारों के लिए सड़क से सदन तक संघर्ष करने वाली सशक्त आवाज़ हैं।
करीब 15 मिनट तक चली मान-मनौव्वल के बाद जब पुलिस ने हिरासत की कार्रवाई शुरू की, तब भी पल्लवी पटेल ने गिरफ्तारी का विरोध करते हुए सड़क पर लेटकर प्रदर्शन किया। यह दृश्य अपने आप में उस राजनीतिक साहस का प्रतीक था, जो आज के दौर में दुर्लभ होता जा रहा है। महिला पुलिसकर्मियों ने उन्हें बाल पकड़कर जबरन वाहन में डाला—यह घटना न केवल लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि सत्ता असहमति से कितनी असहज है।
हिरासत में लिए जाने के बाद पल्लवी पटेल ने जिस स्पष्टता और बेबाकी से अपनी बात रखी, वह उनकी राजनीतिक पहचान का मूल है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग समानता विनियमन 2026 को टालना आरक्षित और वंचित वर्गों के अधिकारों के साथ सीधा अन्याय है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब रातोंरात बड़े संवैधानिक और आर्थिक फैसले लिए जा सकते हैं, तो सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर ही संवेदनशीलता क्यों दिखाई जाती है।
आज पल्लवी पटेल केवल एक विधायक या पार्टी अध्यक्ष नहीं, बल्कि दलितों, पिछड़ों और वंचित तबकों की मजबूत आवाज़ बनकर उभरी हैं। विधानसभा में निर्भीकता से सरकार को आईना दिखाना हो या सड़क पर उतरकर जनसंघर्ष का नेतृत्व करना—उन्होंने बार-बार साबित किया है कि वे समझौतों की राजनीति नहीं, बल्कि अधिकारों की राजनीति करती हैं। प्रदेश भर में फैले उनके समर्थकों का आक्रोश यह साफ संकेत है कि पल्लवी पटेल की यह लड़ाई केवल उनकी नहीं, बल्कि उस समाज की है जिसे बार-बार हाशिये पर धकेला गया है।
लखनऊ की सड़कों पर हुआ यह घटनाक्रम इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज होगा, जहां सत्ता के सामने खड़ी एक निडर महिला नेता ने यह संदेश दिया कि सामाजिक न्याय की लड़ाई में अवरोधक, हिरासत और दमन भी इरादों को कमजोर नहीं कर सकते।






