लखनऊ: उत्तर प्रदेश में अगर किसी एक नीति ने सत्ता और सिस्टम दोनों को कटघरे से निकालकर जनता के पक्ष में खड़ा किया है, तो वह है भूमाफिया पर ‘जीरो टॉलरेंस’। लखनऊ (Lucknow) के इंदिरानगर में मेजर की बीमार बेटी अंजना को 24 घंटे के भीतर न्याय मिलना, सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं—बल्कि उस सोच का प्रमाण है, जहां सत्ता संवेदनशील भी है और सख्त भी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बुधवार को मुलाकात और गुरुवार दोपहर से पहले मकान पर कब्जा—यह गति बताती है कि जब शासन की नीयत साफ हो, तो कानून को रेंगना नहीं पड़ता। यहां न कोई राजनीतिक दबाव चला, न फाइलों का अंबार लगा। सिर्फ सच्चाई, संवेदना और त्वरित कार्रवाई। पिता मेजर, परिवार उजड़ा, मानसिक बीमारी से जूझती एक महिला—और सामने खड़े थे फर्जी दस्तावेजों के सहारे करोड़ों की संपत्ति हड़पने वाले बलवंत कुमार यादव और उसका साथी। यह मामला सिर्फ जमीन कब्जे का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का है, जो कमजोर को सबसे आसान शिकार समझती है। लेकिन इस बार दांव उल्टा पड़ा। जिन कागजों पर कब्जा किया गया, वही कागज हथकड़ी का कारण बने।
जब मुख्यमंत्री सुनते हैं, तो इंसाफ बोलता है अंजना की आंखों से निकले शब्द—“थैंक्यू योगी अंकल! गॉड ब्लेस यू”—किसी राजनीतिक भाषण का हिस्सा नहीं थे। वे उस भरोसे की अभिव्यक्ति थे, जो वर्षों से सताए गए लोगों के दिल में बैठा था, लेकिन अब आवाज़ बनकर निकला। यह वही फर्क है, जो “शिकायत” और “सुनवाई” के बीच होता है।
प्रशासनिक संदेश—अब बीमारी भी ढाल नहीं बनेगी
यह कार्रवाई एक कड़ा संदेश देती है—बीमारी, अकेलापन या असहायता अब भूमाफिया के लिए अवसर नहीं बनेंगे। पुलिस की तत्परता, आरोपियों की त्वरित गिरफ्तारी और कब्जा दिलाना—तीनों मिलकर बताते हैं कि कानून अब सिर्फ किताबों में नहीं, जमीन पर है। यह घटना विपक्ष के लिए असहज सवाल और जनता के लिए सुकून है। असहज इसलिए कि अब “कहानी” गढ़ना मुश्किल है; सुकून इसलिए कि सिस्टम जाग रहा है। अगर 24 घंटे में न्याय मिल सकता है, तो यह अपवाद नहीं—मानक बनना चाहिए। योगी शासन की यह कार्रवाई सिर्फ एक मकान नहीं लौटा रही, बल्कि यह भरोसा लौटा रही है कि उत्तर प्रदेश में अब कमजोर नहीं, कानून मजबूत है।


