– शरद कटियार
दुनिया का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों की कहानी नहीं है; यह उन लोगों की जीवित गाथा है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों को अपनी ताकत बना लिया। जिनके पास न बड़ा सहारा था, न मजबूत बैकअप, न ही आसान रास्ते—फिर भी उन्होंने इतिहास रचा। सच्चाई यही है कि सफलता की असली पूंजी पैसा नहीं, बल्कि जज़्बा है।
27 साल जेल से राष्ट्रपति भवन तक – नेल्सन मंडेला
नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाई। 1962 में उन्हें गिरफ्तार कर 27 वर्षों तक जेल में रखा गया। कठोर श्रम, एकांत कारावास और मानसिक दबाव—ये सब किसी भी व्यक्ति को तोड़ सकते थे। लेकिन मंडेला टूटे नहीं। उन्होंने अपने भीतर नफरत नहीं पाली। 1990 में रिहाई के बाद उन्होंने बदले की राजनीति के बजाय मेल-मिलाप का रास्ता चुना। 1994 में वे दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने।
उनकी कहानी बताती है—समय आपको कैद कर सकता है, लेकिन आपके विचारों को नहीं।
सादगी से साम्राज्य को चुनौती – महात्मा गाँधी
महात्मा गांधी के पास न सेना थी, न हथियार। शरीर पर साधारण धोती और लंगोटी, हाथ में लाठी—लेकिन आत्मबल अटूट। उन्होंने सत्य और अहिंसा को अपना मार्ग बनाया। दांडी मार्च से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक, हर संघर्ष में उनका विश्वास झलकता था। आज दुनिया के अनेक देशों में उनकी प्रतिमाएँ स्थापित हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि त्याग और नैतिक शक्ति किसी भी साम्राज्य से बड़ी होती है।
असफलता से वापसी की मिसाल – स्टीव जॉब्स
स्टीव जॉब्स ने एप्पल की स्थापना की, लेकिन 1985 में उन्हें अपनी ही कंपनी से निकाल दिया गया। यह किसी भी उद्यमी के लिए सबसे बड़ा झटका हो सकता था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। नई कंपनी बनाई, प्रयोग किए और कुछ वर्षों बाद एप्पल में वापसी की। उनकी वापसी के बाद आईमैक , आईपैड और आईफ़ोन जैसे उत्पादों ने तकनीकी दुनिया में क्रांति ला दी। उनकी कहानी बताती है—असफलता अंत नहीं, पुनर्जन्म है।
हॉस्टल के कमरे से डिजिटल क्रांति – मार्क ज़ुकेरबर्ग
मार्क ज़ुकरबर्ग ने कॉलेज के हॉस्टल से एक छोटा सा प्लेटफॉर्म शुरू किया। आलोचनाएँ हुईं, कानूनी चुनौतियाँ आईं, लेकिन उन्होंने निरंतर सुधार जारी रखा। आज उनका मंच अरबों लोगों को जोड़ता है। यह उदाहरण बताता है—उम्र छोटी हो सकती है, लेकिन दृष्टि बड़ी होनी चाहिए।
बार-बार हार, फिर भी अडिग – अब्राहम लिंलन
अब्राहम लिंकन कई चुनाव हारे, व्यापार में असफल हुए, निजी जीवन में कठिनाइयाँ झेलीं। लेकिन उन्होंने प्रयास नहीं छोड़ा। अंततः वे अमेरिका के राष्ट्रपति बने और दास प्रथा के उन्मूलन का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
उनकी यात्रा बताती है—बार-बार गिरना हार नहीं, सीख है।
साधारण परिवार से राष्ट्रपति भवन – ए.पी.जे.अब्दुल कलाम
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने बचपन में अखबार बांटे। सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने शिक्षा को अपना हथियार बनाया। आगे चलकर वे भारत के “मिसाइल मैन” बने और देश के राष्ट्रपति भी।
उन्होंने कहा था—”सपने वो नहीं जो आप सोते समय देखते हैं, सपने वो हैं जो आपको सोने नहीं देते।”
उनका जीवन बताता है—गरीबी बाधा नहीं, प्रेरणा बन सकती है।
हजार असफल प्रयोगों के बाद सफलता – थॉमस एडिसन
थॉमस एडिसन ने बल्ब बनाने से पहले हजारों प्रयोग किए। उनसे पूछा गया कि वे इतने असफल कैसे हुए? उन्होंने कहा—“मैं असफल नहीं हुआ, मैंने केवल वे तरीके खोजे जो काम नहीं करते।”यह सोच ही उन्हें महान आविष्कारक बनाती है।
65 की उम्र में नई शुरुआत – कर्नल सैंडर्स
कर्नल सैंडर्स ने 65 वर्ष की उम्र में केएफसी की शुरुआत की। इससे पहले वे कई बार असफल हुए। लेकिन उन्होंने उम्र को बाधा नहीं बनने दिया।
उनकी कहानी सिखाती है—शुरुआत करने के लिए कभी देर नहीं होती।
बीमारी से जंग और वापसी – युवराज सिंह
युवराज सिंह 2011 विश्व कप के हीरो बने, लेकिन उसी दौरान उन्हें कैंसर का पता चला। इलाज के बाद उन्होंने मैदान में वापसी की।
उनकी कहानी बताती है—शरीर बीमार हो सकता है, मन नहीं।
छोटे शहर से वैश्विक नेतृत्व – सुन्दर पीछाई
साधारण परिवार से आने वाले सुंदर पिचाई ने शिक्षा और मेहनत के दम पर दुनिया की अग्रणी कंपनी गूगल का नेतृत्व संभाला।उनकी यात्रा बताती है—पृष्ठभूमि छोटी हो सकती है, लेकिन सपने नहीं।
इन सभी व्यक्तित्वों की जीवन यात्रा में एक समान सूत्र है
कठिन परिस्थितियाँ,सीमित संसाधन,असफलताओं का सामना करने की क्षमता होनी चाहिए साथ ही अडिग विश्वास जरुरी है।
सफलता के लिए बैकअप जरूरी नहीं, आत्मविश्वास जरूरी है।
उम्र बाधा नहीं, बहाना है।
घर छोड़ने का साहस, आराम का त्याग और निरंतर मेहनत यही असली पूंजी है।स्पष्ट है अगर लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत सच्ची हो और जज़्बा मजबूत हो, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको रोक नहीं सकती।
नामुमकिन कुछ भी नहीं।


