नई दिल्ली/मुंबई: महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों में AIMIM को मिली अप्रत्याशित बढ़त ने एक बार फिर भारतीय राजनीति की जमी हुई धारणाओं को चुनौती दी है। पार्टी अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इस जीत को “किस्मत” बताने वालों पर तीखा प्रहार करते हुए साफ कहा कि ऐसा कहना न केवल राजनीतिक आलस्य का प्रमाण है, बल्कि सीधे–सीधे मतदाताओं का अपमान भी है। ओवैसी (Owaisi) के शब्दों में, “जो लोग इसे किस्मत कहते हैं, वे अपने घमंड के कारण सच्चाई देखने को तैयार नहीं हैं।”
ओवैसी का तर्क सीधा है—राजनीति में सफलता अचानक नहीं मिलती। महाराष्ट्र में एआईएमआईएम ने वर्षों तक जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा किया, एकसमान संदेश दिया और जनता से संवाद बनाए रखा। नतीजा यह हुआ कि पार्टी ने मनसे और एनसीपी (एससी) से अधिक सीटें हासिल कीं। उनके अनुसार, मीडिया और जनता को एक–सा संदेश देना और उस पर टिके रहना ही उनकी रणनीति की रीढ़ रही है।
‘मैं मुसलमानों का नेता नहीं’
जीत के बाद उन्हें “महाराष्ट्र में मुसलमानों का सबसे बड़ा नेता” बताए जाने पर ओवैसी ने स्पष्ट इनकार किया। उनका कहना है कि नेतृत्व को व्यक्ति–केंद्रित नहीं होना चाहिए। “हमारा लक्ष्य सैकड़ों नए नेता तैयार करना है, ताकि राजनीति कुछ चेहरों तक सीमित न रहे।” यह बयान भारतीय राजनीति की उस प्रवृत्ति पर सवाल उठाता है, जहां पहचान और नेतृत्व को अक्सर एक व्यक्ति में समेट दिया जाता है।
बीजेपी के साथ मिलीभगत के आरोपों पर ओवैसी ने पलटवार करते हुए कहा कि उनके खिलाफ फैलने वाली नफरत ही उनकी सफलता का प्रमाण है। उन्होंने याद दिलाया कि जब एआईएमआईएम के चार विधायक तोड़े गए थे, तब किसी ने नैतिकता की बात नहीं की। उनके मुताबिक, एआईएमआईएम का उभार इसलिए खटकता है क्योंकि वह स्थापित राजनीतिक संतुलन को चुनौती दे रही है—और वे इसे आगे भी करते रहेंगे।
नगर निकाय चुनावों में एआईएमआईएम की सीटें 75 से बढ़कर 125 तक पहुँचना केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। ओवैसी कहते हैं कि जीत जनता का दिल जीतने से मिलती है। और यदि हार होती है, तो पार्टी को अपनी कमियों पर आत्ममंथन करना चाहिए—यह स्वीकारोक्ति उन्हें कई पारंपरिक दलों से अलग खड़ा करती है।
हिजाब, संविधान और भविष्य
ओवैसी का वह बयान भी चर्चा में है, जिसमें उन्होंने हिजाब पहनने वाली महिला को प्रधानमंत्री बनते देखने के सपने की बात कही। उनका सवाल सरल है—क्या सपना देखना गुनाह है? वे संविधान का हवाला देते हुए कहते हैं कि भारत का संविधान किसी को नहीं रोकता। जो इससे असहज हैं, वे लोकतांत्रिक भाषा नहीं, बल्कि विभाजन की भाषा बोल रहे हैं।
घुसपैठ और असली मुद्दे
घुसपैठ के मुद्दे पर ओवैसी ने सरकार से सबूत मांगते हुए कहा कि इसे बहाना बनाकर किसी समुदाय या शहर को बदनाम करना गलत है। उन्होंने बेरोजगारी, मॉब लिंचिंग और आर्थिक नीतियों को असली मुद्दे बताते हुए सवाल उठाया कि 11 साल सत्ता में रहने के बावजूद सीमाओं और अर्थव्यवस्था पर ठोस समाधान क्यों नहीं दिखते।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव लड़ने के सवाल पर ओवैसी ने फिलहाल कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। उनका कहना है कि पार्टी नेतृत्व से विचार–विमर्श के बाद सही समय पर निर्णय लिया जाएगा। यह संकेत है किएआईएमआईएम विस्तार से पहले संगठनात्मक मजबूती को प्राथमिकता दे रही है।


