अयोध्या में कोई नहीं बचेगा: विश्वास की कसौटी पर खड़ी सरकार
– मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा दाँव पर
प्रो. एच एन. शर्मा
अयोध्या केवल एक नगर नहीं है, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था, विश्वास और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण देश के लंबे संघर्ष, त्याग और जनभावनाओं का परिणाम है। ऐसे में यदि मंदिर व्यवस्था या चढ़ावे से जुड़े किसी भी प्रकार के आरोप सामने आते हैं, तो स्वाभाविक रूप से समाज की अपेक्षा होती है कि उनकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो तथा दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बड़ी संख्या में लोग केवल एक राजनीतिक नेता के रूप में ही नहीं, बल्कि एक संत परंपरा से जुड़े व्यक्ति के रूप में भी देखते हैं। इसी कारण जनता की उनसे अपेक्षाएं सामान्य राजनीतिक मानकों से कहीं अधिक हैं। लोगों का विश्वास है कि उनके नेतृत्व में कानून सबके लिए समान होगा और किसी भी व्यक्ति को उसके पद, प्रभाव या पहचान के आधार पर संरक्षण नहीं मिलेगा।
अयोध्या का महत्व केवल उत्तर प्रदेश या भारत तक सीमित नहीं है। यह विश्वभर के रामभक्तों की श्रद्धा का केंद्र है। इसलिए यहां होने वाली प्रत्येक गतिविधि पारदर्शिता, ईमानदारी और जवाबदेही की कसौटी पर परखी जाती है। यदि किसी स्तर पर अनियमितता के आरोप लगते हैं, तो उनका निष्पक्ष परीक्षण होना आवश्यक है। इससे न केवल दोषियों की जवाबदेही तय होगी, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास भी और मजबूत होगा।
लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता न्यायपूर्ण प्रक्रिया से ही बनती है। यदि जांच निष्पक्ष, तथ्यों पर आधारित और बिना किसी भेदभाव के होती है, तो उसका संदेश दूर तक जाता है कि कानून के सामने सभी समान हैं। यही सुशासन की पहचान भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जांच एजेंसियां तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर अपना कार्य करें तथा दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कानून के अनुरूप कार्रवाई हो। वहीं, जब तक किसी पर विधिक रूप से दोष सिद्ध न हो, तब तक उसे दोषी घोषित करने से भी बचना चाहिए। यही न्याय और संवैधानिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है।
अयोध्या की गरिमा, श्रीराम मंदिर की पवित्रता और करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि इस दिशा में निष्पक्षता, पारदर्शिता और कानून का समान अनुपालन सुनिश्चित होता है, तो यह केवल एक प्रकरण का समाधान नहीं होगा, बल्कि सुशासन और जनविश्वास की एक मजबूत मिसाल भी बनेगा।
लेखक पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे।


