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Friday, March 27, 2026

बजट में नाम नहीं, फिर भी श्रेय लेने की होड़- फर्रुखाबाद में गंगा तटबंध बना ‘राजनीतिक लॉलीपॉप

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फर्रुखाबाद: 465 करोड़ रुपये की लागत से 49 किलोमीटर लंबे गंगा तटबंध (Ganga embankment) निर्माण की खबर सामने आते ही स्थानीय राजनीति गर्म हो गई है। बाढ़ से राहत का सपना दिखाकर कुछ बीजेपी नेता और समर्थक श्रेय लेने की होड़ में जुट गए हैं, लेकिन जब हकीकत की परतें खोली जाती हैं तो सवाल उठता है?क्या इस परियोजना का उत्तर प्रदेश बजट (budget) में कोई ठोस उल्लेख है?

जमीनी और दस्तावेजी पड़ताल में साफ़ होता है कि उत्तर प्रदेश के मौजूदा बजट में गंगा तटबंध (49 किमी, 465 करोड़) का स्पष्ट, नामित और राशि सहित कोई प्रावधान दर्ज नहीं है। यानी न तो बजट हेड में परियोजना का नाम है और न ही स्वीकृत धनराशि का आधिकारिक उल्लेख। इसके बावजूद फर्रुखाबाद में कुछ नेता इसे अपनी “बड़ी उपलब्धि” बताकर जनता के बीच प्रचार कर रहे हैं।खोजी पड़ताल में यह तथ्य सामने आया कि सिंचाई विभाग स्तर पर प्रस्ताव और प्रारंभिक तैयारी (जैसे भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने की बात) जरूर कही जा रही है, लेकिन वित्तीय स्वीकृति और बजटीय प्रविष्टि के बिना किसी परियोजना को “मंजूर” बताना भ्रामक है।

सरल शब्दों में फाइल चलना और पैसा मिलना, दो अलग बातें हैं।

बाढ़ से हर साल प्रभावित होने वाले 90 से अधिक गांवों और करीब डेढ़ लाख आबादी की पीड़ा को आधार बनाकर राजनीतिक श्रेय बटोरने की कोशिश की जा रही है। पोस्टर, बयान और सोशल मीडिया दावों में यह बताने से परहेज किया जा रहा है कि बजट में पैसा कहाँ दर्ज है? किस मद में है? और कब जारी होगा,फर्रुखाबाद की जनता पहले भी कई बार ऐसे “घोषणात्मक प्रोजेक्ट” देख चुकी है, जो अखबारों और बयानों तक सीमित रहे। बिना बजटीय स्वीकृति के परियोजनाएँ अक्सर चुनावी मौसम में लॉलीपॉप बनती हैं—मीठे वादे, कड़वी हकीकत।

बजट बुक के किस पेज पर 465 करोड़ का प्रावधान है?
क्या कैबिनेट/वित्त विभाग की स्वीकृति मिल चुकी है?

टेंडर कब और किस फंड से जारी होंगे?अगर बजट में नाम नहीं, तो श्रेय किस बात का?इन सवालों के ठोस जवाब अब तक सामने नहीं आए हैं।गंगा तटबंध फर्रुखाबाद की ज़रूरत है इसमें दो राय नहीं। लेकिन बजट में नाम और पैसा आए बिना इसे “उपलब्धि” बताना जनता की आँखों में धूल झोंकने जैसा है। खोजी पड़ताल का निष्कर्ष साफ़ है अभी यह परियोजना काग़ज़ी प्रस्ताव के स्तर पर है, जबकि कुछ नेता इसे ज़मीनी सच्चाई बनाकर पेश कर रहे हैं।

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