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Friday, March 6, 2026

नीतीश कुमार: एक इंजीनियर से बिहार के “सुशासन बाबू” बनने तक

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– और अब देश की सर्वोच्च कुर्सी की ओर
– जंगलराज से विकास की राह तक, बिहार की राजनीति का सबसे लंबा अध्याय 

यूथ इंडिया

: शरद कटियार,

एडिटर इन चीफ

भारतीय राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनका मूल्य उनके जाने के बाद समझ में आता है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उन्हीं नेताओं में गिने जाते हैं। बिहार की राजनीति के पिछले दो दशकों को यदि देखा जाए तो एक बात स्पष्ट होती है—नीतीश कुमार का दौर बिहार में शांति, प्रशासनिक सुधार और बुनियादी विकास का दौर रहा।

साधारण परिवार में जन्में

नीतीश कुमार का जन्म 1 मार्च 1951 को बिहार के नालंदा जिले के बख्तियारपुर में हुआ। उनके पिता रामलखन सिंह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में समाज सेवा करते थे। उनकी माता परमेश्वरी देवी एक धार्मिक और संस्कारी महिला थीं। घर में राष्ट्रवादी माहौल था और यही वातावरण नीतीश कुमार के व्यक्तित्व को आकार देता गया।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई

नीतीश कुमार ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पटना और बख्तियारपुर में प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब एनआईटी पटना) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई की। कुछ समय तक उन्होंने बिहार राज्य बिजली बोर्ड में इंजीनियर के रूप में काम भी किया, लेकिन उनका मन सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में अधिक लगता था।

जेपी आंदोलन से राजनीति की शुरुआत

1970 के दशक में जब देश में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार और तानाशाही के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ, तब नीतीश कुमार भी उससे जुड़ गए। जेपी आंदोलन ने बिहार की पूरी पीढ़ी को राजनीति में नई दिशा दी। इसी आंदोलन से लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे नेता उभरे।

पहला चुनाव और संघर्ष

नीतीश कुमार ने 1977 और 1980 में चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली।
आखिरकार 1985 में वे पहली बार बिहार विधानसभा के सदस्य बने। इसके बाद उनकी राजनीतिक यात्रा तेजी से आगे बढ़ी।

राष्ट्रीय राजनीति में पहचान

1990 के दशक में नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे।
वे लोकसभा के सदस्य बने और बाद में केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे कृषि मंत्री,
रेल मंत्री,सड़क परिवहन मंत्री,
रेल मंत्री रहते हुए उन्होंने कई सुधार किए और रेलवे सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया।
2005: बिहार में बदलाव की शुरुआत
2005 में बिहार की राजनीति में बड़ा मोड़ आया।
लंबे समय से चल रहे जंगलराज और अपराध की छवि से परेशान जनता ने बदलाव का फैसला किया और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने।
उनके शासनकाल में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए,
सड़कों का व्यापक निर्माण,
ग्रामीण क्षेत्रों तक बिजली पहुंचाना,
कानून व्यवस्था में सुधार,
शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार किया।आज बिहार की ग्रामीण सड़कों का नेटवर्क उत्तर भारत के कई राज्यों से बेहतर माना जाता है।महिलाओं और पिछड़ों को सत्ता में भागीदारी के अलावा
नीतीश कुमार ने सामाजिक सुधार के कई कदम उठाए,पंचायतों में महिलाओं को 50% आरक्षण,
अति पिछड़ा वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व,लड़कियों की शिक्षा के लिए, साइकिल योजना,शराबबंदी जैसे सामाजिक प्रयोग इन योजनाओं ने बिहार की सामाजिक संरचना में बड़ा बदलाव लाया।
विकास का “गोल्डन फेज”
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बिहार का सबसे बेहतर दौर 2005 से 2015 के बीच रहा।
इस अवधि में बिहार की विकास दर देश के कई बड़े राज्यों से अधिक रही।
हालांकि उद्योगों के मामले में बिहार अभी भी पीछे रहा, लेकिन बुनियादी ढांचे सड़क, बिजली और प्रशासनिक सुधार में बड़ा परिवर्तन देखने को मिला।
जयप्रकाश नारायण की परंपरा
नीतीश कुमार की राजनीति को अक्सर लोकनायक जयप्रकाश नारायण की वैचारिक परंपरा से जोड़ा जाता है।
दोनों नेताओं में एक समानता यह रही कि उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना।
राजनीति में बदलाव हमेशा होता रहता है।नीतीश कुमार का दौर भी अब धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बनता जा रहा है।लेकिन यह भी सच है कि जंगलराज से विकास की राह तक बिहार को लाने की कहानी में नीतीश कुमार का नाम हमेशा दर्ज रहेगा।
इतिहास अक्सर नेताओं का मूल्यांकन समय बीतने के बाद करता है।संभव है आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति में नए चेहरे उभरें, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बिहार के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में नीतीश कुमार का अध्याय सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में गिना जाएगा।
साथ ही बेटे सुशांत कुमार को उन्होंने जिस प्रकार राजनीति में डिप्टी सीएम की कुर्सी की ओर अग्रसर किया यह भी उनकी बड़ी सूझबूझ और वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की कड़ी माना जा रहा है नीतीश कुमार एक ऐसे नेता हैं जो थमते नहीं है 20 बरस में उन्होंने जैसे बिहार को सुशासन की ओर अग्रसर किया वैसे ही अब मैं धीरे-धीरे देश की सर्वोच्च कुर्सी की ओर भी चल रहे हैं वह बात अलग है कि अगले समीकरण क्या हूं या कोई बड़े संकेत न दिए गए हों लेकिन सुशासन बाबू यूं ही सीएम की कुर्सी नहीं छोड़ देंगे, राजनीतिक बिशात में उनकी हर चाल ने विपक्ष को हमेशा मत ही दी,शह और मात की अगली पारी में नीतीश कुमार की ही जीत के राजनीतिक संकेत बड़े गलियारों में देखे जा रहे हैं। क्योंकि देश के राज भवन में कोई किसी की प्रतीक्षा कर रहा है।

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