नीतीश कुमार: बिहार की राजनीति का वह दौर, जिसकी असली कीमत उनके बाद समझ आएगी

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भरत चतुर्वेदी
बिहार की राजनीति एक बार फिर बदलाव की दहलीज पर खड़ी है। ऐसे समय में बातचीत का केंद्र सिर्फ सत्ता परिवर्तन या मंत्रीमंडल का बंटवारा नहीं है, बल्कि वह व्यक्तित्व भी है जिसकी कार्यशैली ने बिहार के प्रशासन को दशकों तक एक स्थिर आधार दिया—मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। आज जब नई राजनीतिक परिस्थितियों में गृह मंत्रालय भाजपा के लोकप्रिय और उभरते नेता सम्राट चौधरी को सौंपा गया है, तब राजनीतिक गलियारों में कई तरह के संदेश और संकेत पढ़े जा रहे हैं।
नीतीश कुमार की प्रशासनिक शैली को वर्षों से नजदीक से देखने वाले लोग—खासकर वे फॉरवर्ड वर्ग के नेता, जो खुद मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते थे—आज एक अलग तरह के सदमे में हैं। वजह साफ है:
बिहार में प्रशासन और कानून व्यवस्था को नीतीश जितनी साफगोई, निष्पक्षता और संतुलन के साथ चला सकता है, वैसा नेतृत्व उनके जाने के बाद दुर्लभ दिखाई देता है।
भाजपा द्वारा सम्राट चौधरी को गृह मंत्रालय देना महज विभागों का बंटवारा नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। यह संकेत है कि यदि आने वाले समय में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आती है, तो पार्टी किस चेहरे को आगे बढ़ाना चाहती है।
यह निर्णय बिहार की जातीय और सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया कदम भी माना जा रहा है।
बिहार की राजनीति में त्रिवेणी—फॉरवर्ड, ओबीसी और कुर्मी काफी समय से सत्ता के केंद्र में रही है। इनमें कुर्मी समाज की विशिष्ट भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह वर्ग
शिक्षित है,
आर्थिक रूप से सशक्त है,
जमीन से जुड़ा है,
शांत और संतुलित प्रवृत्ति का माना जाता है।
कृषि-प्रधान बिहार में कुर्मी समाज ने हमेशा विकास, शांति और स्थिरता का रास्ता चुना है। इनके हित अक्सर forward जातियों से मिलते रहे हैं, इसलिए इनके बीच टकराव कम और सहयोग अधिक देखने को मिलता है।
इसके विपरीत, कई राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि कोईरी समाज का इतिहास संघर्ष, जुझारूपन और कभी-कभी सत्ता के प्रति आक्रोश से भरा रहा है। नक्सली आंदोलनों में इनकी सक्रियता का इतिहास इस भावना को और मजबूत करता है।
इसलिए आने वाले वर्षों में यदि सत्ता और नेतृत्व बदलेगा, तो भाजपा के लिए इन दो प्रभावशाली ओबीसी समूहों—कुर्मी और कोईरी—के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। यह चुनौती सम्राट चौधरी के उभरने के साथ और भी दिलचस्प हो जाएगी।
चाहे विपक्ष कुछ भी कहे, यह स्वीकार करना होगा कि नीतीश कुमार का दौर—
बुनियादी ढांचे, कानून व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण—सबमें एक स्थिर और सकारात्मक परिवर्तन का दौर रहा।
बिहार जैसी जटिल सामाजिक संरचना वाले राज्य में संतुलन बनाए रखना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं। लेकिन नीतीश ने यह काम न सिर्फ किया, बल्कि वर्षों तक किया।
उनके शासन मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता थी—बोलने से अधिक काम पर विश्वास।
आज बिहार में जो लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं, वे भी इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उनके बाद आने वाला कोई भी नेतृत्व तुलना में छोटा ही दिखाई देगा।
राजनीति बदलती है, चेहरे बदलते हैं, समीकरण बदलते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि कुछ दौर बीतने के बाद ही उनकी असली कीमत समझ आती है।
नीतीश कुमार का दौर भी ऐसा ही एक अध्याय है—
जिसे समय बीतने के बाद बिहार शायद और अधिक सम्मान व गहराई से याद करेगा।

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