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Wednesday, June 10, 2026
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लॉस एंजेलिस के जंगलों में लगी आग का तांडव, 5 मौतें; 1000 घर नष्ट

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कैलिफोर्निया। अमेरिका के लिए नए साल की शुरुआत बेहद खराब रही है। जनवरी के शुरू होते ही कई हमलों की घटनाएं सामने आयी थीं। जिसके बाद कैलिफोर्निया के लॉस एंजेलिस के जगलों में आग (Forest Fire) का तांडव देखने को मिल रहा है। यहां पर तेज हवाओं के कारण जंगल में फैली आग ने जंगलों से लेकर ऊंची-ऊंची इमारतों और आलीशान बगलों को अपनी चपेट में ले लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लॉस एंजेलिस के जंगल की आग मंगलवार को तेज हवाओं के चलते बेकाबू हो गयी। कुछ स्थानों पर हवाओं की रफ्तार 97 किलोमीटर प्रति घंटा होने की वजह से आग की लपटें तेजी से फैलीं। इस भयानक आपदा में पांच लोगों की मौत हो चुकी है। 1,000 से ज्यादा इमारतें नष्ट हो चुकी हैं। हॉलीवुड हिल्स भी इसकी चपेट में आ चुका है। वहीं, लोग अपनी जान बचाने के लिए अपने मकान छोड़कर भाग रहे हैं।

 

 

बताया जा रहा है कि कैलिफोर्निया के लॉस एंजेलिस के कई जंगलों में फैल चुकी है। सबसे पहले आग पैसिफिक पैलिसेड्स के जंगल में लगी, जिसने बढ़ते-बढ़ते ईटन और हर्स्ट के जंगलों को भी अपनी चपेट में ले लिया। अब आग आसपास के जंगलों जैसे लीडिया, वुडली और सनसेट तक फैल गई है, जिसने रिहायशी इलाकों को अपनी जद में ले लिया है। इस दौरान कई हॉलीवुड हस्तियों के बंगले जलकर खाक हो गए हैं।

आग की लपटों के बीच हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों के लिए भागना पड़ा है। यहां तक चिंगारियां गिरने से हड़बड़ी में लोगों ने अपने वाहन छोड़ दिए, लोग पैदल भागते नजर आए और सड़कों पर जाम लग गया। बुधवार को लास एंजेलिस काउंटी में लगभग 1,88,000 घरों में बिजली की व्यवस्था ठप रही। हवा की रफ्तार भी बढ़कर 129 किलोमीटर प्रति घंटा हो गई।

व्यंग्य: दिल्ली का आपदा प्रबंधन

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पंकज शर्मा “तरुण “

वैसे देखा जाए तो इस भावी विकसित भारत देश में अभी भी कई समस्याओं को वर्तमान केंद्र सरकार ने चिन्हित किया है। जिसे आए दिन यशस्वी प्रधानमंत्री जी चुनावी रैलियों में बड़े ही जोशीले अंदाज में कहते पाए जाते हैं कि डबल इंजिन की सरकार बनाओ तभी तुम्हारे प्रदेश को भी विकसित भारत में शामिल कर लेंगे। कुछ राज्यों के अति शिक्षित मतदाता माननीय मोदी जी की बात समझ जाते हैं और अपना अमूल्य वोट उन्हीं को देना सुनिश्चित कर देते हैं। कुछ कम पढ़े लिखे लोग जिनके दिमाग में जन्म से ही पंजे का भूसा भरा होता है तो इनकी बात उनके न तो गले में उतरती है और न भेजे में!

कुछ रमेश बिधूड़ी टाइप के लोग इन दिनों दिल्ली (Delhi) के चुनाव घोषणा की पूर्व संध्या पर आप के गुड़ को गोबर बताने पर अपनी ऊर्जा को झोंकते पाए गए । सड़कों को महिला नेत्री के गालों जैसी चिकनी बनाने के झूठे वादे करते पकड़े गए और खेद प्रकट कर मर्यादा पुरुषोत्तम बनते नजर आए।जैसे चोर चोरी करते पकड़ा जाता है तो माफी मांग लेता है और छूट जाता हो?जब से दिल्ली में चुनाव का कोहरा छाया है सब विपक्षियों ने अपने अपने बंगलों से बाहर आकर प्रदूषण का लेबल और बढ़ा दिया है। कोई जमुना जी को मैली कर उसे साफ नहीं करवाने का आरोप लगा रहा है और अगली सरकार उनकी बनी तो वे इसे गंगा जैसी पवित्र कर देने का वादा कर दावा ठोक रहे हैं।कोई चुनाव जीतने के लिए अपने अपने गाने बनवा कर सुना रहे हैं तो कोई फिल्मी स्टाइल में पोस्टर बना कर एक दूसरे को चोर,झूठा, मक्कार बता रहे हैं।
कहने को दिल्ली में केंद्र सरकार के साथ ही दुनिया भर के दूतावास बने हुए हैं ।

केंद्र सरकार के मंत्री, संतरी ,सांसद, राष्ट्रपति निवास करते है जिनके बंगले भी शाही साज सज्जा से लथपथ हैं। हो भी क्यों न आखिर दिल्ली देश की राजधानी है जिसकी सड़कें हमने आपने सबने देखी हैं। हम सभी देशवासियों को भी दिल्ली पर गर्व है। मगर न जाने क्यों माननीय प्रधानमंत्री जी आज कल अपनी दिल्ली को आपदा ग्रस्त बता रहे हैं?आप की सरकार तो पिछले कई सालों से आम आदमी की जागीर बनी हुई है। अमेरिका के गलियारों में भी यहां के विकास की पिछले दिनों खबर आई थी। क्या विदेशी अखबार भी बिक गए हैं?हो सकता है पैसा किसको बुरा लगता है?फिर हमारे देश के लोकप्रिय बुजुर्ग प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं तो हम तो उन्हीं की बात मानेंगे। किसी झूठे और अन्ना हजारे को धोखा देने वाले जेल रिटर्न केजरीवाल की बात क्यों मानेंगे?

जहां एक और किसान आंदोलन की आपदा पहले से ही हरियाणा यू पी की सीमा पर डेरा डाले बैठी है वहीं दूसरी ओर आप दा के रूप में आतिशी चुनाव प्रचार में केजरीवाल लगे हुए हैं।बेचारी कांग्रेस को तो ये आपदा और भाजपा वाले नेता कोई भी भाव देने को तैयार नहीं शायद इनके माजने ही यही हैं।इनकी सरकारें थी तब ये भी सब आम आदमी को ठेंगे पर बिठाते थे।अब इस बरसों से आई आपदा को खत्म करने के लिए दशकों से एक दूसरे के धुर विरोधी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों जोर आजमाइश में जुट गए हैं। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि आपदा को दूर करने में इन दोनों विरोधी दलों के दिग्गज कामयाब होते हैं या इस कवायद में ये स्वयं ही आपदाग्रस्त होते हैं?हमें तो यह आठ मार्च को ही पता चलेगा।

आकाश से भी ऊंची है सनातन की परंपरा

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हालिया बयान, “आकाश से भी ऊंची है सनातन (Sanatan) की परंपरा,” न केवल भारतीय संस्कृति की गहराई और ऊंचाई को रेखांकित करते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि कैसे सनातन धर्म मानव सभ्यता के लिए मार्गदर्शक बना है। उनकी यह टिप्पणी ‘महाकुम्भ महासम्मेलन’ के दौरान आई, जहां उन्होंने भारत की आध्यात्मिक विरासत, कुम्भ के महत्व और इसके सामाजिक व सांस्कृतिक आयामों पर प्रकाश डाला।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने वक्तव्य में इस तथ्य को रेखांकित किया कि सनातन धर्म न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व की सबसे पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा है। उन्होंने कहा, “हजारों वर्षों की यह विरासत इतनी समृद्ध है कि इसकी तुलना किसी मत, मजहब या संप्रदाय से नहीं की जा सकती।” यह कथन न केवल सनातन धर्म की सार्वभौमिकता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि यह धर्म मानवता को जोड़ने का कार्य करता है।

सनातन परंपरा में कुम्भ जैसे धार्मिक आयोजन केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं हैं। यह आयोजन भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चिंतन के केंद्र रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने इस बात पर जोर दिया कि देवासुर संग्राम के बाद अमृत की बूंदें चार पवित्र स्थलों पर गिरीं—प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक। इन स्थलों पर महाकुम्भ का आयोजन केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ज्ञान और चेतना का महायज्ञ है।

योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की प्रगति और विकास का उल्लेख करते हुए कहा कि महाकुम्भ 2025 विरासत और विकास का अद्भुत संगम होगा। उन्होंने 2019 के प्रयागराज कुम्भ का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे आधुनिक तकनीक और पारंपरिक संस्कृति का समन्वय किया गया। महाकुम्भ का आयोजन इस बार भी वैश्विक मंच पर भारत की सांस्कृतिक समृद्धि को प्रस्तुत करने का अवसर बनेगा।

उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार ने महाकुम्भ को भव्य बनाने के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। इन प्रयासों से यह आयोजन भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्रबंधन क्षमता का एक जीता-जागता उदाहरण बनेगा। योगी आदित्यनाथ ने कहा, “महाकुम्भ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है।”

मुख्यमंत्री ने हिंदू एकता और राष्ट्रीय एकता के बीच गहरे संबंध पर प्रकाश डाला। उनका यह कथन, “हिंदू एकता और राष्ट्रीय एकता को अलग करके नहीं देखा जा सकता,” भारतीय समाज के मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को समझने का महत्वपूर्ण संकेत देता है। इतिहास साक्षी है कि जब समाज बंटा है, तब देश कमजोर हुआ है, और जब एकजुट हुआ है, तब देश ने विजय प्राप्त की है।

योगी आदित्यनाथ ने सनातन धर्म की शक्ति को ‘शिखर पर रहने वाली परंपरा’ कहकर परिभाषित किया। यह धर्म न केवल भौतिक बल्कि आध्यात्मिक ऊंचाई को भी छूता है। उनके अनुसार, “जो लोग समाज को तोड़ने का काम करते हैं, वे दानव परंपरा के हैं। जबकि जोड़ने वाले मानव परंपरा का हिस्सा हैं।”

वक्फ बोर्ड के नाम पर भूमि पर अवैध कब्जे के मुद्दे पर मुख्यमंत्री का सख्त रुख भी चर्चा का विषय बना। उन्होंने कहा, “वक्फ बोर्ड समझ से परे है कि यह धार्मिक संगठन है या भू-माफियाओं का अड्डा।” उन्होंने साफ किया कि वक्फ बोर्ड द्वारा अवैध रूप से कब्जाई गई भूमि की जांच हो रही है, और इसे गरीबों के लिए आवास, शिक्षण संस्थान और अस्पताल बनाने के लिए वापस लिया जाएगा।

यह निर्णय न केवल भूमि विवादों को सुलझाने में मदद करेगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि संसाधनों का उपयोग समाज के विकास के लिए किया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा, “कुम्भ की परंपरा वक्फ से कहीं पुरानी है। इसकी गहराई समुद्र से और ऊंचाई आकाश से भी अधिक है।”

योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषण में समाज को बांटने वाले तत्वों पर भी कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा, “जो विदेशी पैसों के दम पर समाज को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वे देशद्रोही हैं।” यह बयान भारत में सांस्कृतिक और सामाजिक विभाजन फैलाने वाले तत्वों पर उनकी सरकार की कठोर नीति को दर्शाता है।

मुख्यमंत्री ने ऐसे तत्वों को ‘विदेशी जूठन खाने वाले लोग’ कहकर संबोधित किया और जनता को इनके खिलाफ सतर्क रहने की अपील की। यह बयान भारतीय समाज की एकता और अखंडता को बनाए रखने के उनके संकल्प को दर्शाता है।
महाकुम्भ को लेकर मुख्यमंत्री का दृष्टिकोण केवल धार्मिक नहीं है। उनके अनुसार, यह आयोजन जाति, पंथ और लिंग भेद को समाप्त करता है। महाकुम्भ का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना है।

उन्होंने कहा कि महाकुम्भ भारत के ऋषि-मुनियों की तपस्या और चिंतन का परिणाम है। यह आयोजन न केवल परंपरा का सम्मान है, बल्कि इसे भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने का भी माध्यम है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के वक्तव्य में भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के प्रति उनकी गहरी समझ और सम्मान झलकता है। सनातन धर्म केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि मानवता का मार्गदर्शन करने वाला एक आदर्श है।
महाकुम्भ जैसे आयोजन न केवल भारत की समृद्धि और एकता का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि भारत ने अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिकता को अपनाया है। मुख्यमंत्री का यह बयान आने वाले महाकुम्भ के प्रति न केवल उत्साह पैदा करता है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और प्रचारित करने का आह्वान भी करता है।
सनातन की परंपरा आकाश से भी ऊंची और समुद्र से भी गहरी है। यह परंपरा न केवल भारत की पहचान है, बल्कि यह मानवता को जोड़ने वाला एक अद्वितीय सूत्र भी है।

पठनीयता का अभाव, सोशल मीडिया और लघु साहित्यिक पत्र पत्रिकाएं

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विवेक रंजन श्रीवास्तव

मुझे स्मरण है , पहले पहल जब टी वी आया तब पत्रिकाओं और किताबों पर खतरा बताया गया था अब सोशल मीडिया (Social Media) का स्वसंपादित युग आ गया है। अतः यह बहस लाजिमी ही है कि इसका पत्रिकाओं पर क्या प्रभाव हो रहा है ।जो भी हो दुनियां भर में केवल प्रकाशित साहित्य ही ऐसी वस्तु हैं जिनके मूल्य की कोई सीमा नहीं है। इसका कारण है पुस्तकों में समाहित ज्ञान और ज्ञान तो अनमोल होता ही है। लघु पत्रिकाओं के वितरण का कोई स्थाई नेटवर्क नहीं है। वे डाक विभाग पर ही निर्भर हैं, अब सस्ते बुक पोस्ट की समाप्ति हो गई है। अतः मुद्रण से लेकर वितरण तक ये पत्रिकाएं भारी संकट से जूझ रही हैं। अब लघुपत्रिकाओं के लिए ई बुक, फ्लिप फॉर्मेट , पीडीएफ में सॉफ्ट स्वरूप मददगार साबित हो रहा है। पठनीयता का अभाव , कागज और पर्यावरण की चिंता पुस्तकों के हार्ड कापी स्वरूप पर भारी साबित हो रही है। सचमुच एक कागज खराब करने का अर्थ एक बांस को नष्ट करना होता है यह तथ्य अंतस में स्थापित करने की जरूरत है।

प्रकाशन सुविधाओं के विस्तार से आज रचनाकार राजाश्रय से मुक्त अधिक स्वतंत्र है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार आज हमारे पास है। आज लेखन , प्रकाशन व वांछित पाठक तक त्वरित पहुँच बनाने के तकनीकी संसाधन कहीं अधिक सुगम हैं। लेखन और अभिव्यक्ति की शैली तेजी से बदली है ,माइक्रो ब्लागिंग इसका सशक्त उदाहरण है। पर इन सबसे अलग आज नई पीढ़ी में पठनीयता का तेजी से ह्रास हुआ है। साप्ताहिक साहित्यिक अखबार ई वर्जन में दूर दूर पहुंच जाते हैं, लेखक अपनी रचना के स्क्रीन शॉट सोशल मीडिया पर लगाकर धन्य अनुभव करता है। लेखन का पारिश्रमिक मिलना गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। साहित्यिक किताबों की मुद्रण संख्या में कमी हुई है। आज साहित्य की चुनौती है कि पठनीयता के अभाव को समाप्त करने के लिये पाठक व लेखक के बीच उँची होती जा रही दीवार तोड़ी जाये। पाठक की जरूरत के अनुरूप लेखन तो हो पर शाश्वत वैचारिक चिंतन मनन योग्य लेखन की ओर पाठक की रुचि विकसित की जाये। आवश्यक हो तो इसके लिये पाठक की जरूरत के अनुरूप शैली व विधा बदली जा सकती है ,प्रस्तुति का माध्यम भी बदला जा सकता है। इस दिशा में लघु पत्रिकाओं का महत्व निर्विवाद है। लघु पत्रिकाओं का विषय केंद्रित , सुरुचिपूर्ण पाठकों तक सीमित संसार रोचक है।

समय के अभाव में पाठक छोटी रचना चाहता है,तो क्या फेसबुक की संक्षिप्त टिप्पणियों को या व्यंग्य की कटाक्ष करती क्षणिकाओं को साहित्य का प्रमुख हिस्सा बनाया जा सकता है ? यदि पाठक किताबों तक नही पहुँच रहे तो क्या किताबों को पोस्टर के वृहद रूप में पाठक तक पहुंचाया जावे ? क्या टी वी चैनल्स पर किताबों की चर्चा के प्रायोजित कार्यक्रम प्रारंभ किये जावे ? ऐसे प्रश्न भी विचारणीय हैं। जो भी हो हमारी पीढ़ी और हमारा समय उस परिवर्तन का साक्षी है जब समाज में कुंठाएं,रूढ़ियां,परिपाटियां टूट रही हैं। समाज हर तरह से उन्मुक्त हो रहा है,परिवार की इकाई वैवाहिक संस्था तक बंधन मुक्त हो रही है। अतः हमारी लेखकीय पीढ़ी का साहित्यिक दायित्व अधिक है। निश्चित ही आज हम जितनी गंभीरता से इसका निर्वहन करेंगे कल इतिहास में हमें उतना ही अधिक महत्व दिया जावेगा।

किताबें तब से अपनी जगह स्थाई रही हैं जब पत्तों पर हाथों से लिखी जाती थीं। मेरी पीढ़ी को हस्त लिखित और सायक्लोस्टाईल पत्रिका का भी स्मरण है। मैंने स्वयं अपने हाथों से स्कूल में सायक्लोस्टाईल व स्क्रीन प्रिंटेड एक एक पृष्ठ छाप कर पत्रिका छापी है।परिवर्तन संसार का नियम है,आगे और भी परिवर्तन होंगे क्योंकि विज्ञान नित नये पृष्ठ लिख रहा है,मेरा बेटा न्यूयार्क में है , वह ज्यादातर आडियो बुक्स ही सुनता गुनता है किन्तु मेरे लिये बिस्तर पर नींद से पहले हार्ड कापी की लघु पत्रिकाएं और किताबें ही जीवन का हिस्सा है ।

विदेशों में बढ़ रही है भारतीय मूल के लोगों की राजनीतिक सरगर्मी

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अशोक भाटिया , मुंबई

विदेशों में भारतीय मूल (Indian Origin) के लोगों की राजनीति सरगर्मी व उनकी विश्वसनीयता तेजी से बढ़ रही है ।उसकी ताजा मिसाल है कनाडा में होने वाले हालिया चुनाव । खबरों के अनुसार भारतीय मूल की नेता अनीता आनंद प्रधानमंत्री पद की एक मजबूत दावेदार हैं। बता दें जस्टिन ट्रूडो ने लिबरल पार्टी के नेता पद और प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि, वह लिबरल पार्टी के नए नेता चुने जाने तक प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे। अनीता आनंद कनाडा की वर्तमान परिवहन और आंतरिक व्यापार मंत्री हैं। अनीता इंदिरा आनंद का जन्म केंटविले, नोवा स्कोटिया में हुआ था। उनके माता-पिता (दोनों का देहांत हो चुका है) इंडियन फिजिशियन थे। उनके पिता तमिलनाडु से और उनकी मां पंजाब से थीं। आनंद की दो बहनें हैं – गीता आनंद, टोरंटो में एक वकील हैं, और सोनिया आनंद, मैकमास्टर यूनिवर्सिटी में एक फिजिशियन और रिसर्चर हैं।

आनंद 1985 में ओंटारियो चली गईं। उन्होंने और उनके पति जॉन ने अपने चार बच्चों का पालन-पोषण ओकविले में किया। आनंद ने अपने करियर के दौरान अब तक कई पदों पर काम किया है। वह पहली बार 2019 में ओकविले के लिए संसद सदस्य के रूप में चुनी गई थीं। उन्होंने 2019 से 2021 तक सार्वजनिक सेवा और खरीद मंत्री के रूप में कार्य किया और ट्रेजरी बोर्ड के अध्यक्ष और राष्ट्रीय रक्षा मंत्री के रूप में भी काम किया। सार्वजनिक सेवा और खरीद मंत्री के रूप में, आनंद ने कोविड-19 महामारी दौरान कनाडाई लोगों के लिए वैक्सीन, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और रैपिड टेस्ट सुरक्षित करने के लिए अनुबंध वार्ता का नेतृत्व किया। अनीता जब राष्ट्रीय रक्षा मंत्री बनीं, तो उन्होंने सेना में यौन दुराचार के खिलाफ कदम उठाए। उन्होंने रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान कीव को व्यापक सैन्य मदद के साथ-साथ यूक्रेनी सैनिकों की ट्रेनिंग के लिए कर्मियों की व्यवस्था भी की। सितंबर 2024 में, अनीता आनंद को ट्रेजरी बोर्ड के अध्यक्ष के पद के अलावा परिवहन मंत्री भी नियुक्त किया गया। राजनीति के अलावा अनीता आनंद की पहचान एक विद्वान, वकील और रिसर्चर की रही है। वह टोरंटो यूनिवर्सिटी में कानून की प्रोफेसर रही हैं जहां उन्होंने इनवेस्ट प्रोटक्शन और कॉर्पोरेट गर्वनेंस में जेआर किंबर चेयर का पद संभाला था। आनंद ने एसोसिएट डीन के रूप में कार्य किया है और मैसी कॉलेज के गवर्निंग बोर्ड की सदस्य भी रही हैं। वह कैपिटल मार्केट्स इंस्टीट्यूट, रोटमैन स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में नीति और अनुसंधान की निदेशक रही हैं। उन्होंने येल लॉ स्कूल, क्वीन्स यूनिवर्सिटी और वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में भी कानून पढ़ाया है। अनीता आनंद ने क्वीन्स यूनिवर्सिटी से राजनीतिक अध्ययन में बैचलर ऑफ आर्ट्स (ऑनर्स), ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से न्यायशास्त्र में बैचलर ऑफ आर्ट्स (ऑनर्स), डलहौजी यूनिवर्सिटी से बैचलर ऑफ लॉ और टोरंटो यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ लॉ की डिग्री हासिल की है।

कनाडा की अनीता आनंद पहली भारतीय मूल की महिला नहीं है जो किसी दूसरे देश में शीर्ष पद पर पहुचने की तैयारी कर रही है इसके पहले भी भारतीय मूल के कई लोग है जो विदेशों में अपने भारतीय मूल का डंका बजा चुके है ।
हम विदेशों में अपने भारतीय मूल के लोगों का इतिहास देखे तो अमेरिका के सबसे संपन्न और पढ़े लिखे समुदायों में भारतवंशी शीर्ष पर हैं। गौर करने वाली बात ये है कि अब भारतवंशी, अमेरिकी राजनीति में भी अपनी पकड़ बना रहे हैं और बड़ी संख्या में चुनावी राजनीति का हिस्सा बन रहे हैं। अमेरिका में अभी विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के साथ ही स्थानीय निकाय के चुनावों में तीन दर्जन से भी ज्यादा भारतवंशी उम्मीदवारों ने अपनी दावेदारी पेश की ।
अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों के राजनीति में रुझान को इसी बात से समझा जा सकता है कि भारतीय अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने कहा है कि ‘अगर आप खाने की मेज पर नहीं बैठे हैं तो फिर इसका मतलब है कि आप मेन्यू का हिस्सा हैं।’ कैलिफोर्निया में स्थानीय निकाय चुनाव हो रहे हैं और इन चुनाव में सबसे ज्यादा भारतीय मूल के लोग हिस्सा ले रहे हैं। कैलिफोर्निया से ही भारतीय मूल के रो खन्ना और एमी बेरा सांसद हैं। साथ ही राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार रही कमला हैरिस भी कैलिफोर्निया से ही ताल्लुक रखती हैं।

साथ ही अदला चिश्ती डिस्ट्रिक्ट 11 के लिए काउंटी सुपरवाइजर के लिए चुनाव लड़ रही हैं। आलिया चिश्ती सिटी कॉलेज बोर्ड सैन फ्रांसिस्को के लिए, दर्शना पटेल स्टेट असेंबली के लिए, निकोल फर्नाडेज सैन मेटो सिटी काउंसिल के लिए, निथ्या रमन लॉस एंजेल्स सिटी काउंसिल के लिए, रिचा अवस्थी फोस्टर सिटी काउंसिल के लिए और सुखदीप कौर एमरीविले सिटी काउंसिल के लिए चुनाव लड़ रही हैं। सिलिकॉन वैली में भारतीय इंजीनियर्स का खूब प्रभाव है, अब यहां की राजनीति में भी भारतीय अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। भारतीय मूल की तारा श्रीकृष्णन सिलिकॉन वैली में डिस्ट्रि्क्ट 26 से कैलिफोर्निया स्टेट असेंबली के लिए चुनाव लड़ रही हैं।

डॉ। अजय रमन मिशिगन डिस्ट्रिक्ट 14 के लिए ऑकलैंड काउंटी कमिश्नर पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि अनिल कुमार और रंजीव पुरी मिशिगन स्टेट हाउस के लिए चुनाव मैदान में हैं। प्रिया सुंदरेशन एरिजोना में स्टेट सीनेट के लिए, रवि शाह स्कूल बोर्ड के लिए, पेंसिल्वेनिया में आनंद पाटके, अन्ना थॉमस और अरविंद वेंकट स्टेट हाउस के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं निकिल सावल स्टेट सीनेट के लिए उम्मीदवार हैं। इलिनोइस से भारतवंशी अनुषा थोटाकुरा स्कूल बोर्ड के लिए और नबील सैयद स्टेट हाउस के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।

अश्विन रामास्वामी, जॉर्जिया स्टेट सीनेट के लिए चुनाव मैदान में हैं और अगर वे चुने जाते हैं तो वे सबसे कम उम्र के सीनेटर होंगे। ओहायो में चैंतल रघु काउंटी कमिश्नर पद के लिए और पवन पारिख काउंटी क्लर्क ऑफ कोर्ट्स पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। वर्जीनिया में डैनी अवुला रिचमंड के मेयर पद के लिए चुनाव मैदान में हैं। इसी तरह न्यूयॉर्क में जेरेमी कोनी और मनिता संघवी स्टेट सीनेट, जोहरान ममदानी स्टेट असेंबली के लिए चुनाव मैदान में हैं। टेक्सास राज्य में सिटी काउंसिल के लिए भारतीय मूल की आशिका गांगुली, नबील शिके, रमेश प्रेमकुमार, रवि सैंडिल, सलमान भोजानी, शेखर सिन्हा, शेरिन थॉमस, सुलेमान लालानी सिटी काउंसिल, स्टेट हाउस और जज पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं मनका ढींगरा वाशिंगटन राज्य के अटॉर्नी जनरल पद और मोना दास सार्वजनिक भूमि के आयुक्त पद के लिए चुनावी रेस में शामिल हैं।

भारतीय मूल के दो अमेरिकियों ने शीर्ष पदों पर आसीन होकर इतिहास रच दिया। अरुणा मिलर और विवेक मुलक ने अमेरिकी राज्यों मैरीलैंड और मिसौरी के उपराज्यपाल और कोषाध्यक्ष (वित्त मंत्री) के रूप में शपथ ली । भारत में पैदा हुईं अरुणा मिलर ने अमेरिका के मैरीलैंड राज्य की पहली इंडियन अमेरिकन लेफ्टिनेंट गवर्नर बनी। अरुणा मिलर ने भगवत गीता पर हाथ रखकर शपथ ली और पद संभाला। 58 साल की अरुणा का जन्म भारत के हैदराबाद में हुआ था। वे 1972 में अपने परिवार के साथ अमेरिका गई थीं। उन्हें साल 2000 में अमेरिका की नागरिकता मिली थी। अरुणा मैरीलैंड राज्य की 10वीं लेफ्टिनेंट गवर्नर हैं। 2010 से 2018 तक वे मैरीलैंड के हाउस ऑफ डेलीगेट में भी रही थीं। उन्होंने वहां अपने दो कार्यकाल पूरे किए थे। अरुणा भारतीय-अमेरिकी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। लेफ्टिनेंट गवर्नर के चुनाव में कई ट्रम्प समर्थकों ने उनका समर्थन किया था।

यूनाइटेड किंगडम के इतिहास में पहली बार, देश का नेतृत्व एक गैर-श्वेत व्यक्ति द्वारा प्रधानमंत्री के रूप में किया गया है। 42 साल की उम्र में ऋषि सुनक, जोकि एक हिंदू हैं, ब्रिटेन के 200 से अधिक वर्षों के इतिहास में सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री भी रहे । यह किसी इतिहास से कम नहीं है। प्रत्येक भारतीय के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण रहा क्योंकि पहली बार यूनाइटेड किंगडम में भारतीय मूल का कोई प्रधानमंत्री बना । लेकिन यह पहली बार नहीं था जब कोई भारतीय मूल का व्यक्ति भारत के बाहर एक प्रमुख नेता बना।

गुयाना के नौवें कार्यकारी अध्यक्ष, मोहम्मद इरफान अली, जिन्होंने अगस्त 2020 में कार्यभार संभाला, गुयाना के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति हैं। लियोनोरा में एक मुस्लिम इंडो-गुयाना परिवार में पैदा होने के कारण, इरफान नूर हसनाली के बाद अमेरिका में दूसरे मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष भी हैं।एंटोनियो कोस्टा ने 2015 में पुर्तगाल के प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। उनकी जड़ें भारत से संबंधित हैं क्योंकि उनका पैतृक परिवार गोवा से है, जबकि उनके पिता ऑरलैंडो दा कोस्टा का जन्म मोजाम्बिक, पूर्वी अफ्रीका में हुआ था।चंद्रिकापरसाद “चान” संतोखी को सूरीनाम (दक्षिण अमेरिकी देश) के राष्ट्रपति के रूप में चुना गया था। इससे पहले 1991 में, नीदरलैंड में पुलिस अकादमी में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद संतोखी को पुलिस प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया था। सूरीनाम के राष्ट्रपति के रूप में संतोखी की नियुक्ति एक बड़ी सफलता थी क्योंकि इसने देश में तानाशाही को समाप्त कर दिया था।

प्रवीण जगन्नाथ, जो 2017 से मॉरीशस के प्रधानमंत्री हैं, भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश से हैं। जगन्नाथ का जन्म ला कैवर्ने में अहीरों के एक हिंदू परिवार में हुआ था।मॉरीशस में भारतीय मूल के प्रधान मंत्री होने के अलावा उनके राष्ट्रपति भी हैं, जिनका एक भारतीय संबंध भी है। पृथ्वीराजसिंह रूपुन जीसीएसके या प्रदीप सिंह रूपुन, जिन्होंने 2019 में कार्यभार संभाला, एक हिंदू परिवार में पैदा हुए और आर्य समाज के अनुयायी हैं।हाल ही में अपने कार्यकाल के दो साल पूरे करने वाले सेशेल्स के राष्ट्रपति वेवेल रामकलावन का भी भारत के साथ एक अजीब संबंध है। सेशेल्स के एक द्वीप माहे में पैदा होने के कारण, रामकलावन के दादा बिहार, भारत के नागरिक थे।हलीमा याकूब, जो 2017 में सिंगापुर की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। इनका जन्म एक भारतीय पिता और एक मलय मां से हुआ था। इससे पहले एक वकील, हलीमा ने देश के आठवें राष्ट्रपति के रूप में चुने जाने से पहले सिंगापुर के स्पीकर के रूप में भी काम किया था।

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Board Exams

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चरण 1: एक मजबूत रणनीति बनाना

1. एक यथार्थवादी अध्ययन कार्यक्रम बनाएं

अपने दिन की योजना एक स्पष्ट कार्यक्रम के साथ बनाएं जिसमें सभी विषयों के लिए समय आवंटित हो। कमजोर क्षेत्रों पर अधिक ध्यान दें लेकिन मजबूत विषयों को नजरअंदाज न करें। सुनिश्चित करें कि आपके पास बर्नआउट से बचने के लिए पर्याप्त ब्रेक हों।

2. परीक्षा पैटर्न और सिलेबस को समझें

आप कहां उत्कृष्टता प्राप्त कर सकते हैं और कौन से क्षेत्र चुनौती पेश कर सकते हैं, इसकी पहचान करने के लिए पाठ्यक्रम और परीक्षा पैटर्न की गहन समीक्षा करें। प्रश्नों और समय प्रबंधन से परिचित होने के लिए पिछले वर्षों के प्रश्न पत्रों का अभ्यास करें।

3. मूल अवधारणाओं में महारत हासिल करें

केवल तथ्यों को याद रखने के बजाय मूल अवधारणाओं की गहरी समझ विकसित करें। योग्यता-आधारित प्रश्नों के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। सीखने को आसान बनाने के लिए निमोनिक्स और विजुअल एड्स जैसे माइंड मैप और फ्लैशकार्ड जैसे अंकी जैसे उपकरणों का उपयोग करें।

4. सक्रिय पुनरीक्षण तकनीकों को शामिल करें

सक्रिय पुनरीक्षण आपकी स्मृति में अवधारणाओं को मजबूत करता है। स्व-प्रश्नोत्तरी जैसी तकनीकों का उपयोग करें विषयों को अपने शब्दों में सारांशित करें या बेहतर समझ के लिए किसी और को पढ़ाएं।

5. स्वस्थ और हाइड्रेटेड रहें

बर्नआउट को रोकने के लिए पोमोडोरो तकनीक जैसी विधियों का उपयोग करके छोटे, नियमित ब्रेक लेना याद रखें। सुनिश्चित करें कि आप नियमित जलयोजन के साथ स्वस्थ आहार का पालन करें और अपने दिमाग को तेज रखने के लिए कम से कम 7-8 घंटे की नींद लें।

चरण 2: शोधन और पॉलिशिंग (अंतिम 1 महीना)

6. उच्च स्कोरिंग क्षेत्रों पर ध्यान दें

वेटेज के आधार पर महत्वपूर्ण अध्यायों को प्राथमिकता दें। ये आपके स्कोर को बढ़ा सकते हैं इसलिए इनमें महारत हासिल करने के लिए समर्पित समय आवंटित करें।

7. परीक्षा स्थितियों का अनुकरण करें

मॉक टेस्ट आपको वास्तविक परीक्षा के दबाव के अनुरूप ढलने और अपना समय प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में मदद करते हैं। सप्ताह में दो बार समयबद्ध परिस्थितियों में मॉक परीक्षा दें।

8. एक गलती ट्रैकर बनाए रखें

अभ्यास परीक्षणों के दौरान की गई गलतियों को रिकॉर्ड करने के लिए एक जर्नल रखें। अपने शिक्षक के साथ इनकी समीक्षा करें और मुख्य परीक्षा में इन्हें दोहराने से बचने के लिए मॉक टेस्ट दोबारा दें।

9. समय निकालना – किसी ऐसी गतिविधि/शौक/खेल के लिए जिसका आप वास्तव में आनंद लेते हैं (दिन में कम से कम 30-45 मिनट के लिए)

चरण 3: फ़ाइन-ट्यूनिंग (अंतिम 2 सप्ताह)

10. अपने दिमाग पर ज्यादा बोझ डालने से बचें

यह थोड़ा धीमा होने का समय है। नई सीख सीमित रखें और जो आप पहले से जानते हैं उसे दोहराने पर ध्यान केंद्रित करें। इससे आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद मिलती है और तनाव कम होता है। इस समय, यह सुनिश्चित करने के लिए कि आप महत्वपूर्ण विवरण बनाए रखते हैं, संक्षिप्त नोट्स/सारांशों पर ध्यान केंद्रित करें।

बोर्ड परीक्षाएँ कठिन लग सकती हैं, लेकिन एक स्पष्ट योजना और निरंतर प्रयास के साथ, छात्र उत्कृष्टता प्राप्त कर सकते हैं और अपनी अपेक्षाओं को पार कर सकते हैं। याद रखें, ये दो महीने शक्तियों को अधिकतम करने, कमजोरियों को दूर करने और स्वस्थ मानसिकता बनाए रखने के बारे में हैं।