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Wednesday, February 25, 2026

नेहरू के विरोध से मोदी की रणनीतिक साझेदारी तक: भारत-इस्राइल रिश्तों की बदलती दास्तान

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो दिवसीय इस्राइल दौरे के साथ भारत-इस्राइल संबंध एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में हैं। करीब आठ वर्षों बाद हो रही इस यात्रा में पीएम मोदी अपने समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू और राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग से मुलाकात करेंगे तथा इस्राइली संसद नेसेट को संबोधित कर सकते हैं। यह वही देश है, जिसके गठन का कभी भारत ने पुरजोर विरोध किया था और संयुक्त राष्ट्र में उसके पक्ष में मतदान से दूरी बनाई थी।
1930-40 के दशक में जब यूरोप में यहूदियों पर अत्याचार बढ़े और फलस्तीन में अलग यहूदी राष्ट्र की मांग उठी, तब महात्मा गांधी ने स्पष्ट कहा था कि “फलस्तीन अरबों का है।” स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू सरकार ने 1947 की संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना के खिलाफ मतदान किया और 1949 में इस्राइल की सदस्यता का भी विरोध किया। हालांकि 1950 में भारत ने इस्राइल को औपचारिक मान्यता दे दी, परंतु चार दशकों तक पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए।
1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 व 1971 के युद्धों के दौरान इस्राइल ने गुप्त रूप से सैन्य सहायता दी, जबकि भारत सार्वजनिक रूप से फलस्तीन के समर्थन में खड़ा रहा। 1974 में भारत ने फलस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को मान्यता दी और 1988 में फलस्तीन को राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया। शीत युद्ध की समाप्ति और आर्थिक उदारीकरण के बाद 1992 में भारत और इस्राइल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित हुए, जिसने रक्षा, कृषि और तकनीक सहयोग का नया अध्याय खोला।
1999 के कारगिल युद्ध से लेकर 2003 में इस्राइली प्रधानमंत्री एरियल शेरोन की भारत यात्रा और 2017 में पीएम मोदी की ऐतिहासिक इस्राइल यात्रा तक, दोनों देशों के रिश्तों में निरंतर प्रगाढ़ता आई है। आज भारत इस्राइल के रक्षा उपकरणों का प्रमुख खरीदार है और द्विपक्षीय व्यापार अरबों डॉलर तक पहुंच चुका है।
हालांकि भारत अब भी दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है और फलस्तीन के प्रति अपनी ऐतिहासिक प्रतिबद्धता दोहराता है, लेकिन रणनीतिक, तकनीकी और सुरक्षा हितों के चलते इस्राइल के साथ उसकी साझेदारी अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुकी है। नेहरू युग की वैचारिक दूरी से लेकर मोदी युग की खुली रणनीतिक मित्रता तक, भारत-इस्राइल संबंधों की यह यात्रा भारतीय विदेश नीति के बदलते स्वरूप की एक महत्वपूर्ण कहानी बयान करती

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