डॉ विजय गर्ग
आज मंगल एक शुष्क लाल रेगिस्तान है, लेकिन अतीत में वह ऐसा नहीं था अरबों साल पहले मंगल की सतह पर तरल पानी और एक वायुमंडल ने उसे नीली दुनिया दिया था। एक बड़ा सवाल यह है कि मंगल लाल रेगिस्तान में कैसे तब्दील हुआ ? नासा का मावेन अंतरिक्ष यान इस समय मंगल के चारों तरफ घूम रहा है। उसने मंगल के बारे में जो नए आंकड़े जुटाए हैं उससे पता चलता है कि मंगल का वायुमंडल अरबों वर्ष से अंतरिक्ष में लीक हो रहा है, जिससे यह समझने में मदद मिलती है कि कैसे एक समय की नीली दुनिया एक लाल रेगिस्तान बन गई। नई रिसर्च का नेतृत्व कोलोराडो बोल्डर यूनिवर्सिटी में ग्रह भौतिकविद शैनन करी
किया है। वह नासा के मावेन मिशन की प्रमुख जांचकर्ता हैं। मंगल ग्रह पृथ्वी के आकार का लगभग आधा है, जिसका अर्ध व्यास 3390 किलोमीटर है और एक दिन 24.6 घंटे का होता है। इसकी झुकी हुई घूमने की धुरी इसे ऐसे मौसम देती है जो हमारे मौसम से ज्यादा लंबे होते हैं,
क्योंकि ग्रह को सूर्य का चक्कर लगाने में 687 पृथ्वी दिवस लगते हैं। नासा के अंतरिक्ष यान से ली गई तस्वीरों में प्राचीन नदी घाटियां, झील के बेसिन और 4800 किलोमीटर से ज्यादा लंबी एक घाटी प्रणाली दिखाई देती हैं जो क्रस्ट (पपड़ी) पर बनी हुई हैं। इस तरह का लैंडस्केप ज्यादा घने आसमान के नीचे लंबे समय तक सतह पर बहते पानी से ही संभव था।
अपने इतिहास की शुरुआत में मंगल ग्रह पर शायद एक मैग्नेटोस्फीयर (चुंबकीय मंडल) था। चुंबकीय मंडल किसी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र द्वारा बनाया गया अंतरिक्ष का एक क्षेत्र है जो सूर्य से आने वाले विद्युत चार्ज वाले कणों को मोड़ देता है। जब चार अरब साल पहले मंगल की चुंबकीय सुरक्षा खत्म हो गई, तो ऊपरी वायुमंडल सौर पवन की पूरी ताकत के संपर्क में आ गया। मंगल पर चल रही मुख्य पलायन प्रक्रिया एटमास्फेरिक स्पटरिंग’ कहलाती है, जिसमें ऊर्जावान कण वायुमंडलीय परमाणुओं से टकराते हैं और उन्हें अंतरिक्ष में धकेल देते हैं। मंगल ग्रह पर वे कण मुख्य रूप से सौर पवन के भारी आयन ( एक या अधिक पाजिटिव या नेगेटिव चार्ज वाले अणु) हैं जो चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं पर ऊपरी वायुमंडल में टकराते हैं। साथ ही, मावेन उपग्रह के अवलोकन से पता चलता है कि ऊपरी वायुमंडल में ले जाए गए पानी के अणु विखंडित हो जाते हैं और हाइड्रोजन छोड़ते हैं जो अंतरिक्ष में चली जाती है। मंगल पर रहने लायक स्थिति शायद ज्यादातर वायुमंडल के खत्म होने से पहले तक ही सीमित थी।
नासा के क्यूरियोसिटी, पर्सेवरेंस रोवर और मावेन उपग्रह अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि वह समय कितना लंबा चला। मंगल कैसे एक नीली दुनिया से लाल रेगिस्तान में बदल गया, यह समझ कर विज्ञानी यह तय कर पाएंगे कि दूर के बाहरी ग्रह अपने वायुमंडल और सतह के पानी को बनाए रख सकते हैं या नहीं।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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