अनुराग तिवारी
लखनऊ (प्रादेशिक): प्राकृतिक खेती केवल एक खेती पद्धति नहीं, बल्कि एक आंदोलन है जो किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करता है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां खेती ही अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, प्राकृतिक खेती अपनाना समय की मांग है। यदि सही प्रशिक्षण, बाजार और सरकारी सहयोग मिले, तो यह मॉडल न केवल किसानों की आय बढ़ा सकता है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य भी सुनिश्चित कर सकता है।
उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में आज खेती कई चुनौतियों से जूझ रही है—मिट्टी की घटती उर्वरता, बढ़ती लागत, रासायनिक खादों पर निर्भरता और किसानों की कम होती आमदनी। ऐसे समय में प्राकृतिक खेती एक ऐसा विकल्प बनकर उभर रही है, जो न केवल खेती की लागत घटाती है बल्कि जमीन, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को भी सुरक्षित रखती है।
प्राकृतिक खेती का मूल सिद्धांत है—प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर खेती करना। इसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि देसी गाय के गोबर-गौमूत्र, जीवामृत, बीजामृत और प्राकृतिक संसाधनों का सहारा लिया जाता है। वही उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार दोनों प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY), भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP), किसानों को प्रशिक्षण, डेमो प्लॉट और सब्सिडी दी जा रही है। कई जिलों (जैसे: बुंदेलखंड, वाराणसी, लखनऊ मंडल) में प्राकृतिक खेती क्लस्टर बनाए गए हैं।
क्या है प्राकृतिक खेती?
प्राकृतिक खेती (Natural Farming) ऐसी कृषि पद्धति है जिसमें रासायनिक खाद और दवाओं का उपयोग नहीं होता, मिट्टी की जीवंतता (Soil Biology) को बढ़ाया जाता है, स्थानीय संसाधनों पर आधारित खेती होती है, फसल, पशुपालन और प्रकृति के बीच संतुलन बनाया जाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका देसी गाय की मानी जाती है, क्योंकि उसके गोबर और गौमूत्र से तैयार घोल (जैसे जीवामृत) खेत की उर्वरता को प्राकृतिक रूप से बढ़ाते हैं। गोबर खाद केवल एक पारंपरिक तरीका नहीं, बल्कि आधुनिक प्राकृतिक खेती की रीढ़ है। उत्तर प्रदेश के किसान अगर अपने पशुओं के गोबर का सही उपयोग करें, तो वे बिना ज्यादा खर्च के अपनी खेती को लाभकारी बना सकते हैं।


