– नमामि गंगे और जल जीवन मिशन , की निकली हवा
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में गंगा की सफाई और हर ग्रामीण घर तक नल से शुद्ध पेयजल पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू की गई केंद्र व राज्य सरकार की दो महत्वाकांक्षी योजनाएं—नमामि गंगे और जल जीवन मिशन—अब दम तोड़ रहीं हैं। बीते लगभग एक दशक में हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह खर्च होने के बावजूद न तो नदियों की स्थिति पूरी तरह सुधर सकी है और न ही प्रदेश के सभी ग्रामीण परिवारों को नियमित नल से जल मिल पा रहा है।गंगा तो आज भी मैली ही हैं। और वाटर ट्रीटमेंट प्रोजेक्ट सपने में ही रह गए।
वर्ष 2015 में शुरू की गई नमामि गंगे योजना के तहत उत्तर प्रदेश में गंगा और उसकी सहायक नदियों की सफाई, सीवेज प्रबंधन और घाटों के विकास पर बड़े पैमाने पर काम किया गया। विभिन्न सरकारी रिपोर्टों और बजटीय आंकड़ों के अनुसार, अब तक यूपी में ₹12,000 से ₹15,000 करोड़ के बीच राशि खर्च हो चुकी है।
योजना के अंतर्गत कई शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाए गए, लेकिन स्थिति यह है कि
कई एसटीपी समय पर पूरे नहीं हो सके,कई स्थानों पर वे आंशिक क्षमता से ही चल रहे हैं,छोटे शहरों और कस्बों में आज भी नालों का गंदा पानी सीधे नदियों में गिर रहा है।
नदी किनारे बसे ग्रामीण क्षेत्रों में गंगा की स्थिति आज भी दुर्गंध, झाग और प्रदूषित जल के रूप में देखी जा सकती है, जिससे सरकारी दावों पर प्रश्नचिह्न लगता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट दूर करने के लिए जल जीवन मिशन (हर घर जल) शुरू किया गया था। लक्ष्य था कि 2024 तक हर ग्रामीण घर में नल से जल पहुंचे।
उत्तर प्रदेश में अनुमानित 3.3 से 3.5 करोड़ ग्रामीण परिवार हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बड़ी संख्या में घरों को नल कनेक्शन दे दिए गए हैं और कई जिलों को 100 प्रतिशत कवरेज घोषित किया जा चुका है।
लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां करती है—कई गांवों में पानी रोज़ नहीं आता,कहीं दबाव इतना कम कि टंकी नहीं भर पाती,कहीं पानी की गुणवत्ता संदिग्ध (आयरन, खारापन, बदबू)।
ग्रामीणों का कहना है कि “नल तो लग गया, लेकिन पानी के लिए आज भी हैंडपंप और टैंकर का सहारा लेना पड़ता है।”
प्रदेश के कई जिलों से मिल रही शिकायतों के अनुसार फर्रुखाबाद, कन्नौज, औरैया, एटा, इटावा, समेत बुंदेलखंड में सैकड़ो गांवों में कनेक्शन के बावजूद सप्लाई अनियमित है।
कानपुर और प्रयागराज में सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट की समस्या अब भी गंगा को प्रदूषित कर रही है।वाराणसी में रिवरफ्रंट क्षेत्र चमकदार दिखता है, लेकिन आसपास के गांवों में पेयजल और सीवेज प्रबंधन अधूरा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों योजनाओं की सबसे बड़ी कमजोरी ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस है।
पाइपलाइन, मोटर, टंकी और जल शोधन संयंत्र लगाने पर तो खर्च हुआ, लेकिन—रख-रखाव के लिए स्थायी बजट नहीं,पंचायत और जल समितियों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं,
शिकायत निवारण व्यवस्था सुस्त बनी हुई है।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने खर्च का प्रचार ज्यादा और नतीजों की अनदेखी की है। उनका कहना है कि “हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बह गए, लेकिन आम आदमी की प्यास नहीं बुझी।”
वहीं सत्तापक्ष का दावा है कि योजनाएं दीर्घकालिक हैं और उनके परिणाम चरणबद्ध तरीके से सामने आएंगे।
नमामि गंगे और जल जीवन मिशन जैसी योजनाएं अपने उद्देश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में आंकड़ों और वास्तविकता के बीच का अंतर साफ नजर आने लगा है।जब तक नदी वास्तव में साफ नहीं होती और हर घर को रोज़ाना सुरक्षित पेयजल नहीं मिलता, तब तक इन योजनाओं की सफलता पर सवाल उठते रहेंगे।

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