आभास मिश्रा
नवाबगंज /फर्रुखाबाद होली का त्योहार रंगों, उमंग और आपसी मिलन का प्रतीक है, लेकिन जिन घरों में बीते एक वर्ष के भीतर किसी अपने के बिछड़ने की अनहोनी हुई होती है, वहां अक्सर त्योहार की रौनक फीकी पड़ जाती है। ऐसे परिवारों के आंसुओं को पोंछने और उनके जीवन में पुनः उत्साह का संचार करने के लिए नवाबगंज नगर व ग्रामीण क्षेत्रों में ‘फाग’ गायकों की टोलियां पूरी तरह सक्रिय हो गई हैं। ये टोलियां ‘अनराये’ उठाने की उस प्राचीन और अनूठी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं, जो मानवता और सामाजिक समरसता की मिसाल पेश करती है।
जैसे-जैसे होली नजदीक आ रही है, नवाबगंज के चहुंओर फाग की खुमारी बढ़ने लगी है। लेकिन इस उत्सव के बीच उन परिवारों को नहीं भुलाया गया है जो गमगीन हैं। परंपरा के अनुसार, होली से पूर्व जिन घरों में ‘गमी’ (मृत्यु) हुई होती है, वहां शाम ढलते ही ढोलक, चिमटा, झांझ और मंजीरा जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ फाग गायकों की टोलियां पहुंचती हैं। इसे स्थानीय भाषा में ‘अनराये उठाना’ कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य शोकाकुल परिवार को मुख्यधारा के उत्सव से जोड़ना और उनके दुख को साझा करना होता है।
ये टोलियां गमी वाले घरों के चबूतरे या दालान में बैठकर वाद्य यंत्रों की थाप पर फाग का गायन करती हैं। फाग के गीतों के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि जीवन नश्वर है और खुशियों का फिर से स्वागत करना ही जीवन का नाम है। नवाबगंज के बरतल निवासी जानवीर खाँ उर्फ राजू, लालाराम, रामेश्वर दयाल, रामभजन, लड्डू सिंह, करू जैसे अनुभवी गायक इस नेक कार्य में जुटे हैं। वहीं, नगला धोबियन से राम लखन सिंह, गुड्डू सिंह, जुगाड़ी राजपूत सिंह और नगला हीरासिंह के कप्तान सिंह राजपूत, घारम सिंह राजपूत, संतराम व नितेश जैसे युवा और बुजुर्ग गायक अपनी टोलियों के साथ रात-रात भर इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
शाम होते ही जब ये टोलियां नगर की संकरी गलियों और मोहल्लों से गुजरती हैं, तो ढोलक की मधुर थाप और फाग के ऊंचे स्वर सुनकर राहगीर अनायास ही रुक जाते हैं। फाग गायन का आकर्षण ऐसा है कि आसपास के लोग भी टोली के साथ बैठ जाते हैं और न केवल फाग का आनंद लेते हैं, बल्कि गायकों का उत्साहवर्धन भी करते हैं।
”यह सिर्फ गायन नहीं, बल्कि समाज के प्रति हमारा दायित्व है। हम कोशिश करते हैं कि होली के रंग किसी के घर में फीके न रहें।” — रामेश्वर दयाल फाग गायक
नवाबगंज की यह परंपरा न केवल सांस्कृतिक विरासत को सहेज रही है, बल्कि यह जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर आपसी भाईचारे को भी मजबूती प्रदान करती है। फाग की टोली जब किसी के घर से ‘अनराये’ उठाकर निकलती है, तो उस परिवार को भी यह आभास होता है कि पूरा समाज उनके दुख-सुख में साथ खड़ा है।


