संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद ज़ियाउर रहमान बर्क ने लोकसभा में बिना पुख्ता सबूत के होने वाली गिरफ्तारियों पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई मामलों में आरोप साबित होने से पहले ही लोगों को लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जहां जमानत मिलना मुश्किल हो जाता है। इस स्थिति को उन्होंने “प्रक्रिया ही सजा बन जाना” बताया, जो न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी भी प्रकार की हिंसा, उग्रवाद या आतंकवाद का समर्थन करना नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सवाल उठाना और असहमति जताना नागरिकों का अधिकार है। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि ‘लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म’ के नाम पर ऐसा माहौल बना दिया गया है, जिसमें आम नागरिक, छात्र, पत्रकार, समाजसेवी और वकील भी संदेह के घेरे में आ जाते हैं।
सांसद बर्क ने सवाल उठाया कि क्या सरकार से सवाल करना या संविधान और न्याय की बात करना अपराध माना जाने लगा है। उन्होंने कहा कि कई बार सरकार की आलोचना करने वालों या कमजोर वर्गों और आदिवासियों के अधिकारों की बात करने वालों को ‘अर्बन नक्सल’ या ‘एंटी नेशनल’ कहकर चुप कराने की कोशिश की जाती है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।
उन्होंने यह भी कहा कि अत्यधिक सख्त कानूनों के कारण समाज में डर का माहौल बनता है, जिससे लोग अपनी बात रखने से हिचकने लगते हैं। कई मामलों में बिना ठोस साक्ष्य के गिरफ्तारी हो जाती है, मुकदमे वर्षों तक चलते हैं और न्याय में देरी होती है। मानवाधिकार संगठनों द्वारा भी इस विषय पर चिंता जताई जा चुकी है।
आदिवासी समुदाय का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वे देश के मूल निवासी हैं और उनकी जमीन व जंगल पर सदियों से अधिकार रहा है। लेकिन विकास परियोजनाओं के नाम पर उन्हें उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है। जब वे अपने अधिकारों की मांग करते हैं, तो उन्हें नक्सल समर्थक बताकर दबाने की कोशिश की जाती है, जो उनके अस्तित्व और अधिकारों दोनों के लिए गंभीर खतरा है।


