मुजफ्फरनगर में ‘मेंहदी जिहाद’ का विवाद: करवा चौथ पर बढ़ा धार्मिक तनाव

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मुजफ्फरनगर| उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से एक अजीबोगरीब और चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जिसने करवा चौथ जैसे पारंपरिक और शुभ त्यौहार को भी राजनीतिक और धार्मिक बहस का केंद्र बना दिया है। यहां कुछ ऐसे दृश्य देखे गए हैं, जिनसे यह साफ होता है कि त्योहारों को सामाजिक और सांस्कृतिक रंग देने की जगह, कुछ लोग इसे मजहबी तर्क और साज़िशों के बहाने तनाव फैलाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, करवा चौथ के अवसर पर सड़कों पर क्रांति सेना की महिला मोर्चा कार्यकर्ता हाथों में लाठियां लेकर उतरीं और उन्होंने दावा किया कि हिंदू बहनों और बेटियों के हाथों में मेहंदी लगाने वाले मुस्लिम युवक किसी योजना के तहत ‘मेंहदी जिहाद’ चला रहे हैं। उनका यह भी आरोप है कि इसी के जरिए ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा दिया जा रहा है।
महिला मोर्चा की कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक रूप से अपील की कि हिंदू महिलाएं किसी भी मुस्लिम युवक से अपने हाथों में मेहंदी न लगवाएं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर किसी मुस्लिम युवक को हिंदू महिलाओं को मेहंदी लगाते हुए पाया गया तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी और उन्हें लाठी से सबक सिखाया जाएगा।
इस घटना ने पूरे इलाके में हलचल पैदा कर दी है। करवा चौथ जैसी पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को राजनीतिक और धार्मिक रंग देने की कोशिश ने स्थानीय नागरिकों में चिंता और डर की भावना पैदा कर दी है। कई लोगों का मानना है कि त्योहारों के अवसर पर इस तरह की गतिविधियाँ सामाजिक सौहार्द और साम्प्रदायिक शांति के लिए खतरा बन सकती हैं।
स्थानीय प्रशासन ने फिलहाल स्थिति का आकलन किया है और इलाके में तनाव न बढ़े, इसके लिए पुलिस और कानून व्यवस्था के अतिरिक्त इंतजाम किए हैं। हालांकि, इस पूरे मामले ने सोशल मीडिया पर भी गहरी बहस छेड़ दी है, जहां कुछ लोग इसे सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाली घटना मान रहे हैं, जबकि अन्य का कहना है कि इसे राजनीतिक रंग देकर धार्मिक भावनाओं को भड़काया जा रहा है।
इस विवाद ने करवा चौथ जैसे पवित्र और पारंपरिक त्योहार को भी समाज में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव का प्रतीक बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि त्योहारों को केवल सांस्कृतिक और सामाजिक सौहार्द के अवसर के रूप में देखना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक या धार्मिक साज़िश के बहाने।
मुजफ्फरनगर की यह घटना यह स्पष्ट करती है कि त्योहारों के माध्यम से समाज में फैल रही गलतफहमियों और अफवाहों पर नियंत्रण रखना आज की जरूरत बन गई है। प्रशासन, समुदाय और नागरिकों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि त्योहार केवल सांस्कृतिक, पारंपरिक और सौहार्दपूर्ण माहौल में मनाए जाएं और किसी भी तरह की साम्प्रदायिक या हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा न मिले।

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