1989 में मेले में आए थे तत्कालीन मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी
(उपकार मणि “उपकार “)
फर्रुखाबाद। हिंदू धर्म की आस्था की प्रतीक मोक्षदायिनी मां गंगा नदी के तट पर बसा उत्तर प्रदेश का जिला फर्रुखाबाद वैसे तो कई चीजों के लिए प्रसिद्ध है। परंतु इस जिले की पहिचान का एक बड़ा कारण फर्रुखाबाद के गंगा नदी के तट पांचाल घाट पर लगने वाला राम नगरिया मेला है। इस मेले को मिनी कुंभ के नाम से भी जाना जाता है। जानकारी के अनुसार सन् 1950 के आस पास इस मेले की शुरुआत हुई थी। उस समय इस स्थान को घटियाघाट के नाम से जाना जाता था। उस समय यहां काफी कम संख्या मे साधु संतों ने झोपड़ी डालकर माघ के महीने मे गंगा नदी के तट पर कल्पवास करना शुरू किया था। सन् 1955 मे पूर्व विधायक महरम सिंह ने इस मेले मे रुचि लेते हुए साधु संतों के साथ कांग्रेस पार्टी का एक कैंप लगाया था। इस बार उन्होंने मेले मे शिक्षा, स्वतंत्रता संग्राम और सहकारिता का सम्मेलन कराया था। अगले वर्ष 1956 मे राजेपुर और शहजहांपुर जिले के अल्लाहगंज क्षेत्र के कुछ लोगों ने मेले मे झोपड़ी डालकर कल्पवास किया था। फिर क्या देखते देखते ही मेले की ख्याति और कल्पवासियों की संख्या बढ़ने लगी। सन् 1965 मे मेले मे कल्पवास करने पहुंचे स्वामी श्रद्धानंद के प्रस्ताव पर मेले का नाम रामनगरिया रख दिया गया। आस पास के जिलों मे यह मेला रामनगरिया के नाम से प्रसिद्ध होने लगा। सन् 1970 मे गंगा नदी पर पुल का निर्माण कराया गया। इस पुल का नाम लोहिया सेतु रखा गया। लोहिया सेतु के बनने से आवागमन की सुविधा बहाल हुई जिससे मेले मे पड़ोसी जिलों के कल्पवासियों की संख्या बढ़ने लगी और मेले मे अच्छी खासी भीड़ होने लगी। सन् 1985 तक यह संख्या बढ़कर हजारों मे पहुंच गई। जिसके बाद जिला परिषद को मेले की व्यवस्था का जिम्मा सौंप दिया गया। इसी वर्ष प्रशासन ने सड़क के दोनो तरफ मेला रामनगरिया के प्रवेश द्वारों का निर्माण कराया था। सन् 1989 मे पूर्व विधायक महरम सिंह द्वारा तत्कालीन मुख्यमंत्री एन डी तिवारी को मेले मे आने का न्योता दिया गया। मुख्यमंत्री ने न्योता स्वीकार कर लिया और मुख्यमंत्री एन डी तिवारी ने घटियाघाट के इस मेले मे आकर सूरजमुखी गोष्ठी मे हिस्सा लिया। गोष्ठी के बाद उन्होंने मेले का अवलोकन किया और उन्होंने इस मेले को प्रतिवर्ष 5 लाख रुपए देने की घोषणा कर दी। मुख्यमंत्री के आने से इस मेले की ख्याति मे चार चांद लग गए और वर्तमान में यह मेला रामनगरिया कई प्रदेशों मे मिनी कुंभ के नाम से जाना जाता है। लोगों की मांग पर सरकार ने घटियाघाट का नाम बदलकर पंचालघाट रख दिया। आज यह क्षेत्र पांचाल घाट के नाम से विख्यात है। इस मेले के सरकारी पंडाल मे विभिन्न आयोजन होते रहते हैं। जिससे जिले की संस्कृति और सभ्यता का प्रचार प्रसार होता है। इस रामनगरीया मेले की अपनी एक पत्रिका निकलती है जिसमें इस रामनगरिया मेले संबंधी सभी जानकारियां साझा की जाती हैं।




