प्रयागराज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा के सेक्टर-150 में इंजीनियर युवराज मेहता की डूबने से हुई मौत के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने घटना के दौरान राहत एवं बचाव कार्य में हुई संभावित लापरवाही पर गंभीर सवाल उठाते हुए एसडीआरएफ और एनडीआरएफ से विस्तृत जवाब मांगा है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब घटनास्थल पर पुलिस, फायर ब्रिगेड, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ जैसी प्रशिक्षित टीमें मौजूद थीं और पर्याप्त समय भी उपलब्ध था, तो युवक को बचाया क्यों नहीं जा सका। अदालत ने निर्देश दिया कि हलफनामे में यह स्पष्ट किया जाए कि बचाव के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए, मौके पर मौजूद टीम के सदस्यों और कमांडिंग अधिकारियों के नाम क्या थे, तथा उन्हें आपात स्थितियों से निपटने के लिए किस प्रकार का प्रशिक्षण दिया गया है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए। अदालत ने कहा कि प्राधिकरण ने 6 फरवरी 2026 को लापरवाह बिल्डरों को नोटिस तो जारी किए, लेकिन यह जानकारी नहीं दी कि उन कमियों को वास्तव में सुधारा गया या नहीं और उसका सत्यापन किस प्रकार किया गया। कोर्ट ने यह भी पूछा कि नोएडा में आपातकालीन स्थितियों के लिए कोई नोडल अधिकारी नियुक्त है या नहीं, और जब यह पूरी घटना लाइव प्रसारित हो रही थी, तब प्राधिकरण का कौन सा अधिकारी मौके पर मौजूद था।
याचिकाकर्ता हिमांशु जायसवाल ने जनहित याचिका में मांग की है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा के सभी खुले निर्माण स्थलों, बेसमेंट और खतरनाक जल निकायों का कोर्ट की निगरानी में ऑडिट कराया जाए। साथ ही युवराज मेहता की मौत की निष्पक्ष जांच के लिए हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र उच्च स्तरीय समिति गठित करने और शहरी आपात स्थितियों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने की भी अपील की गई है। मामले की अगली सुनवाई 20 मार्च को सुबह 10 बजे निर्धारित की गई है।
इधर ग्रेटर नोएडा में इस मामले को लेकर सियासी प्रतिक्रिया भी तेज हो गई है। विधायक तेजपाल नागर ने प्रेसवार्ता में कहा कि यह एक बेहद दुखद हादसा था और इसमें जो भी जिम्मेदार पाए जाएंगे, उन सभी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि घटना के बाद कई अधिकारियों पर कार्रवाई हो चुकी है, जिनमें डीसीपी और एसीपी का स्थानांतरण भी शामिल है।
विधायक ने यह भी बताया कि नोएडा प्राधिकरण में लंबे समय से तैनात डीजीएम सिविल को हटाया गया है, जबकि उनकी ओर से भेजे गए पत्र पर संज्ञान न लेने वाले दो इंजीनियरों और संबंधित सीईओ के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है। उन्होंने दोहराया कि यदि कोई अब तक कार्रवाई से बचा है, तो उसे भी बख्शा नहीं जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने शहरी क्षेत्रों में सुरक्षा मानकों, निर्माण स्थलों की निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस मामले में और अहम खुलासे होने की संभावना है।
युवराज मेहता मौत मामला: हाईकोर्ट सख्त, राहत-बचाव में चूक पर SDRF-NDRF से जवाब तलब, जिम्मेदारों पर कार्रवाई के संकेत


