फर्रुखाबाद| समेत प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में रोजगार की आधारशिला मानी जाने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। योजना का नाम बदला, पोर्टल बदले, प्रक्रियाओं को डिजिटल और पारदर्शी बताकर प्रचारित किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि समस्याएं कम होने के बजाय पहले से कहीं अधिक जटिल और गहरी हो गई हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों का आरोप है कि उन्हें दो-दो महीने तक मजदूरी का भुगतान नहीं मिल रहा। जिन हाथों ने तालाब खोदे, सड़कें बनाई, पंचायत भवनों की मरम्मत की और गांवों को विकास की राह पर आगे बढ़ाया, वही हाथ आज अपने परिवार के लिए रोटी जुटाने को संघर्ष कर रहे हैं। मजदूरी रुकने का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई, घर के राशन और दवाइयों पर पड़ रहा है। कई परिवार उधार लेकर गुजारा कर रहे हैं, जिससे कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
स्थिति केवल श्रमिकों तक सीमित नहीं है। एपीओ, ग्राम रोजगार सेवक, तकनीकी सहायक, कंप्यूटर ऑपरेटर और लेखा सहायकों का लगभग आठ माह से मानदेय लंबित है। ये वही कर्मचारी हैं जो योजना के क्रियान्वयन की पूरी जिम्मेदारी संभालते हैं—मस्टर रोल तैयार करना, ऑनलाइन एंट्री करना, तकनीकी स्वीकृति देना, भुगतान प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और शासन के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना। इसके बावजूद उन्हें समय पर उनका हक नहीं मिल पा रहा।
कर्मचारियों का कहना है कि पहले जहां काम सीमित दायरे में था, अब डिजिटल पोर्टल, ई-केवाईसी, भू-टैगिंग, सर्वे, बीएलओ ड्यूटी और अन्य अतिरिक्त दायित्वों ने कार्यभार कई गुना बढ़ा दिया है। दिन-रात काम करने के बाद भी आर्थिक असुरक्षा बनी हुई है। त्योहारों के समय यह संकट और गहरा जाता है, जब परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना भी चुनौती बन जाता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि योजना के नाम और स्वरूप में बदलाव के बावजूद भुगतान प्रणाली की खामियां जस की तस बनी हुई हैं। कागजों में पारदर्शिता और समयबद्धता के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर देरी, तकनीकी अड़चनें और प्रशासनिक उदासीनता ने व्यवस्था को अविश्वसनीय बना दिया है। ग्रामीण विकास की धुरी मानी जाने वाली यह योजना यदि समय पर भुगतान ही सुनिश्चित न कर सके, तो उसके उद्देश्य पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा जैसी योजनाएं केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने का माध्यम हैं। जब मजदूरी और मानदेय महीनों तक अटका रहता है, तो उसका असर पूरे बाजार और स्थानीय व्यापार पर पड़ता है। गांव की छोटी दुकानों से लेकर स्कूलों तक इसकी मार दिखाई देती है।
स्पष्ट है कि केवल नाम बदलने या नई घोषणाएं करने से हालात नहीं सुधरेंगे। जरूरत है ठोस प्रशासनिक इच्छाशक्ति, पारदर्शी भुगतान प्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की। जब तक श्रमिक और कर्मचारी दोनों को समय पर उनका अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक योजना का वास्तविक उद्देश्य अधूरा ही रहेगा और असंतोष की चिंगारी सुलगती रहेगी।

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