शरद कटियार
जब किसी राज्य की सड़कों को विकास का आईना कहा जाता है, तब ऐसी सड़कें लोगों की उम्मीदों का मार्ग बनती हैं। लेकिन जब वही सड़कें भ्रष्टाचार (scams) और लापरवाही की परतों में ढँक जाएं, तो सवाल उठाना लाज़मी हो जाता है — और इटावा-बरेली हाईवे (संभवतः NH-730C) की मौजूदा हालत ऐसे ही एक सवाल की गुहार है।
इस हाईवे का निर्माण राज्य के लिए गौरव का विषय होना चाहिए था, लेकिन यह शर्मिंदगी और जनता के साथ विश्वासघात का प्रतीक बनकर उभरा है। हल्की बरसात में ही सड़क की परतें उखड़ जाना इस बात की गवाही देता है कि तकनीकी मानकों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। सड़क निर्माण में बेस और सब-बेस की गुणवत्ता, बिटुमिन की परतों की मजबूती और जल निकासी जैसी बुनियादी बातों की अनदेखी करना एक साधारण भूल नहीं, बल्कि सुनियोजित लापरवाही या कहें ‘प्रॉफिट फ्रेंडली क्राइम’ है।
यह भी समझने की जरूरत है कि इस पूरे प्रकरण में सन्नाटा सबसे ज्यादा बोलता है। जब न तो PWD और न ही राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग का कोई अधिकारी सामने आता है, जब जिलाधिकारी तक सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं देता, तो यह चुप्पी खुद में एक आरोप बन जाती है। क्या यह चुप्पी किसी दबाव की उपज है? या यह भ्रष्ट तंत्र की रक्षा के लिए बनाई गई एक मौन दीवार?
लोकतंत्र में जब जनता की आवाज़ अनसुनी कर दी जाती है, तब प्रतिनिधियों से उम्मीद की जाती है कि वे प्रश्न उठाएं। फर्रुखाबाद के सांसद मुकेश राजपूत ने इस घोटाले पर केंद्रीय मंत्री को शिकायत भेजी — यह प्रशंसनीय कदम है, लेकिन इसका परिणाम क्या रहा? शून्य। महीनों बीत गए, न जांच शुरू हुई, न ही कोई कार्यवाही हुई। यह नकारात्मक प्रतिक्रिया सिर्फ सांसद की असफलता नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की निष्क्रियता का संकेत है।
‘सड़क नहीं तो टोल नहीं’ का नारा सरकार की नीति बन चुका है, पर सवाल यह है कि ऐसी सड़कों पर टोल वसूली किस नैतिक आधार पर की जा रही है? क्या केवल नाम की सड़कें बनाकर कंपनियां जनता के पैसे की लूट कर सकती हैं? पूर्व अभियंता वीके त्रिपाठी की टिप्पणी इस मामले में तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण है। यदि एक वरिष्ठ अभियंता यह कह रहा है कि गुणवत्ता से समझौता हुआ है, तो इसकी स्वतंत्र जांच क्यों नहीं की जाती? क्या जनता की जान और करदाताओं का पैसा इतना सस्ता हो गया है?
इस संपादकीय का उद्देश्य किसी एक एजेंसी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि सिस्टम की सामूहिक निष्क्रियता पर प्रश्न खड़ा करना है। जब विकास की नींव ही भ्रष्टाचार की मिट्टी पर डाली जाए, तो इमारत कभी टिक नहीं सकती। सरकार को इस मामले में त्वरित जांच, सार्वजनिक रिपोर्ट और दोषियों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
आज सवाल सिर्फ एक हाईवे की बदहाली का नहीं है, बल्कि यह पूरे विकास मॉडल पर एक चुनौती है — क्या हम सच में जवाबदेह शासन व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, या फिर केवल टेंडरों और कमीशन की चक्की में आमजन की उम्मीदें पीसी जा रही हैं?
शरद कटियार
ग्रुप एडिटर
यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप


