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Tuesday, March 3, 2026

अधिक उत्पादन–अधिक नुकसान की नीति से जूझ रही खेती, खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने की मांग

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अन्नदाता की मेहनत से देश आत्मनिर्भर, अब ‘मूल्य संवर्धन’ पर जोर जरूरी
फर्रुखाबाद। देश को खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वह हमारे अन्नदाता किसान हैं। किसानों की अथक मेहनत और दिन-रात की तपस्या का ही परिणाम है कि आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में मजबूत स्थिति में खड़ा है।
लेकिन इस उपलब्धि के साथ एक गंभीर चिंता भी जुड़ी हुई है। वर्तमान कृषि व्यवस्था “अधिक उत्पादन–अधिक नुकसान” के फार्मूले पर चल रही है, जो किसानों के लिए आर्थिक संकट का कारण बनती जा रही है। उत्पादन बढ़ता है, लेकिन उचित भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार व्यवस्था के अभाव में किसानों को उनकी फसल का समुचित मूल्य नहीं मिल पाता।
वरिष्ठ किसान नेता अशोक कटियार, ने कहा कि अब समय आ गया है कि केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और समुचित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जाए। उनका मानना है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित हों, कोल्ड स्टोरेज की पर्याप्त व्यवस्था हो और कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन किया जाए, तो किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि फल, सब्जी, अनाज और दुग्ध उत्पादों के संरक्षण व प्रसंस्करण की बेहतर व्यवस्था से बर्बादी को रोका जा सकता है। इससे न केवल किसानों को लाभ मिलेगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि कृषि नीति को उत्पादन आधारित मॉडल से निकालकर मूल्य आधारित मॉडल की ओर ले जाया जाए। जब तक प्रसंस्करण उद्योग और आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ नहीं किया जाएगा, तब तक किसानों की मेहनत का पूरा लाभ उन्हें नहीं मिल पाएगा।
अन्नदाता की मेहनत का सम्मान तभी सच्चे अर्थों में होगा, जब उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित किया जाए और कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाया जाए।

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