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Saturday, January 24, 2026

काशी, आस्था और ‘सफेद झूठ’ की राजनीति

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शरद कटियार

काशी (Kashi) केवल एक शहर नहीं, भारत की आत्मा का प्रतीक है। यहां की गलियों, घाटों और मंदिरों में सदियों की आस्था, परंपरा और संस्कृति समाई हुई है। ऐसे में काशी के विकास को लेकर यदि अफवाहें फैलाई जाएं, तो वह केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहता, बल्कि सीधे-सीधे जनभावनाओं पर प्रहार बन जाता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Chief Minister Yogi Adityanath) द्वारा काशी में की गई प्रेसवार्ता इसी पृष्ठभूमि में बेहद महत्वपूर्ण है।

उन्होंने मंदिरों और मणिकर्णिका घाट को तोड़े जाने के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि एआई-जनरेटेड और भ्रामक वीडियो के जरिए “सफेद झूठ” फैलाया जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि वीडियो झूठे हैं या सच्चे, सवाल यह है कि आखिर काशी के विकास से किसे डर है?

विकास बनाम दुष्प्रचार

पिछले 11 वर्षों में काशी ने जो परिवर्तन देखा है, वह अभूतपूर्व है। आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण के साथ-साथ आधुनिक सुविधाओं का विकास—यह संतुलन आसान नहीं होता। फिर भी सरकार का दावा है कि आस्था से कोई समझौता नहीं किया गया। मणिकर्णिका घाट का पुनर्विकास हो या अन्य परियोजनाएं, धार्मिक प्रक्रियाओं और परंपराओं को अक्षुण्ण रखने की बात बार-बार दोहराई गई है। मुख्यमंत्री का यह कहना कि “विकास और विरासत” साथ-साथ चलेंगे, दरअसल उस राजनीतिक बहस को भी चुनौती देता है, जिसमें हर विकास कार्य को आस्था-विरोधी बताने की कोशिश की जाती है।

‘मेरी काशी’ और राष्ट्रीय दृष्टि

काशी का प्रतिनिधित्व स्वयं नरेंद्र मोदी द्वारा किया जाना केवल राजनीतिक संयोग नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय दृष्टि का संकेत है। “मेरी काशी” का भाव यही बताता है कि यह शहर अब केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक आध्यात्मिक मानचित्र पर अपनी नई पहचान बना रहा है। इसी दृष्टि के तहत परियोजनाएं बनीं—पुरानी काया को संरक्षित रखते हुए नया स्वरूप।

आंकड़े जो कहानी कहते हैं

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में हुआ विस्फोट सिर्फ पर्यटन की सफलता नहीं, बल्कि विश्वास का प्रमाण है। प्रतिदिन सवा लाख से डेढ़ लाख श्रद्धालु और विशेष अवसरों पर लाखों की भीड़—यह बताती है कि काशी का आकर्षण बढ़ा है, घटा नहीं। सरकार का दावा है कि काशी ने अब तक देश की जीडीपी में लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये का योगदान दिया है। यदि यह सही है, तो यह विकास और आस्था के सहअस्तित्व का ठोस उदाहरण है।

मंदिरों को तोड़े जाने के आरोपों पर मुख्यमंत्री का तर्क सीधा है—जीर्ण-शीर्ण मंदिरों का पुनरुद्धार हुआ है, न कि ध्वस्तीकरण। यह बहस नई नहीं है। अतीत में भी विकास कार्यों को लेकर ऐसे ही आरोप लगे, जो बाद में तथ्यहीन साबित हुए। सवाल यह है कि क्या हर पुनरुद्धार को तोड़फोड़ कह देना ईमानदार राजनीति है?

मां अन्नपूर्णा की मूर्ति का प्रसंग उठाकर मुख्यमंत्री ने कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाया। यह केवल एक मूर्ति की वापसी का मुद्दा नहीं, बल्कि विरासत के प्रति राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रश्न है। 1947 से 2014 तक लंबा समय सत्ता में रहने के बावजूद यदि प्रयास नहीं हुए, तो यह आलोचना स्वाभाविक है।

काशी आज एक चौराहे पर खड़ी है—एक ओर सदियों पुरानी आस्था, दूसरी ओर आधुनिक विकास की राह। इस संतुलन को बिगाड़ने की कोशिशें यदि दुष्प्रचार के जरिए होती हैं, तो उनका जवाब तथ्यों से देना जरूरी है। मुख्यमंत्री योगी का बयान केवल कांग्रेस पर हमला नहीं, बल्कि उस राजनीति पर सवाल है जो हर विकास को संदेह की नजर से देखती है। काशी का भविष्य आस्था और विकास के समन्वय में है—और “सफेद झूठ” की राजनीति इस यात्रा को रोक नहीं सकती।

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