कन्नौज के ट्रैफिक इंचार्ज आफाक़ खान के साथ हुआ व्यवहार समाज के लिए सवाल

 सड़क पर नियमों की पाठशाला लगाने वाला अफसर, विवादों में घिरकर पुलिस लाइन भेजा गया—क्या इंसानियत की कोई पहचान नहीं होती?

कन्नौज।जनपद में ट्रैफिक व्यवस्था को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ने वाले ट्रैफिक इंचार्ज आफाक़ खान आज एक ऐसे मोड़ पर खड़े कर दिए गए हैं, जहां उनके वर्षों के ईमानदार कार्य, जन-जागरूकता और लोकप्रियता पर कुछ आरोप भारी पड़ते नजर आ रहे हैं। दिन-रात सड़कों पर खड़े होकर न सिर्फ ट्रैफिक नियमों का पालन कराते, बल्कि आम नागरिकों को प्रेमपूर्वक समझाते-बुझाते आफाक़ खान ने पुलिस विभाग की छवि को सकारात्मक दिशा दी।

आफाक़ खान का काम सिर्फ चालान काटना नहीं था—वे दुर्घटनाओं से बचाव, हेलमेट व सीट बेल्ट की अनिवार्यता, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर लगातार लोगों को जागरूक करते रहे। उनकी यह कार्यशैली उन्हें जनता के बीच लोकप्रियता के शिखर तक ले गई। लोग उन्हें एक सख्त अफसर नहीं, बल्कि मददगार इंसान के रूप में जानते थे।
लेकिन हालिया घटनाक्रम में उन पर लगाए गए आरोपों के आधार पर उन्हें पुलिस लाइन भेज दिया गया। सवाल यह नहीं कि जांच हो या न हो—कानून अपना काम करेगा—सवाल यह है कि क्या किसी अफसर की पूरी सेवा-यात्रा, उसकी निष्ठा और जनहित के कार्यों को एक झटके में नजरअंदाज कर देना न्यायसंगत है?
इस पूरे घटनाक्रम ने समाज के सामने एक कड़वा प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या पहचान, नाम या मजहब मेहनत और इंसानियत से बड़ा हो गया है? यह विडंबना ही है कि जिस अधिकारी को लोग “सड़क का शिक्षक” मानते थे, उसी को आज संदेह की नजर से देखा जा रहा है।
लोकतंत्र और कानून-व्यवस्था की मजबूती इसी में है कि जांच निष्पक्ष हो, पूर्वाग्रह से मुक्त हो और किसी भी अधिकारी को उसकी पहचान से नहीं, उसके कर्मों से आंका जाए। आफाक़ खान का मामला सिर्फ एक अधिकारी का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो इंसानियत और ईमानदारी को पीछे धकेल देती है।
आज जरूरत है कि हम यह याद रखें—वर्दी के भीतर इंसान होता है, और इंसानियत किसी मजहब, नाम या पहचान की मोहताज नहीं होती। अगर आफाक़ खान ने सच में कर्तव्यनिष्ठा से काम किया है, तो न्याय को भी उतनी ही निष्ठा से सामने आना चाहिए। यही समाज और व्यवस्था दोनों की कसौटी है।

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