फर्रुखाबाद: कन्नौजी (Kannauji) बोली के संरक्षण,प्रचार एवं प्रोत्साहन के क्रम में कन्नौजी कन्नौजी बोली समूह के बैनर तले आभासी पटल पर “कन्नौजी बोली : परंपरा, संकट और पुनरुद्धार” विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया किया। संगोष्ठी की शुरुआत कन्नौजी बोली की कवयित्री सुमन पाठक द्वारा सरस्वती वंदना के साथ हुआ।संगोष्ठी में विषय प्रवर्तन पर बात करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय (Allahabad University) के छात्र पारस सैनी ने आईआईटी रोपड़ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए वर्तमान समय में संगोष्ठी के विषय की प्रासंगिकता पर बात की।
संगोष्ठी में आमंत्रित वक्ता प्रो. अंबिका बाजपेई, इतिहास विभाग, नवयुग कन्या महाविद्यालय, लखनऊ ने कन्नौज के वैदिक कालीन इतिहास और कन्नौज के नामकरण पर विस्तृत रूप से चर्चा की। वक्ता के रूप में उपस्थित बरेली के महेश मधुकर ने साहित्य में कन्नौजी की स्थिति पर बात करते हुए। कन्नौजी बोली में स्वरचित ‘ ठंडी ठंडी चलै हवा’ प्रस्तुत की।
मुख्य वक्ता के रूप में षष्ठीपूर्ति प्राप्त प्रधानाचार्य बीरेंद्र कुमार चन्द्रसखी ने कन्नौजी बोली की परंपरा पर बात करते हुए भाषा के इतिहास, ब्रिटिश काल तथा वर्तमान समय में कन्नौजी भाषा की अवस्थिति पर प्रकाश डाला। कन्नौजी बोली के प्रोत्साहन और विकास के संदर्भ में इन्होंने कहा कि ज्यादा से ज्यादा आप बोलचाल में कन्नौजी बोली का प्रयोग हो और दस्तावेजीकरण हो।
जम्मूर्रत बेगम ने कारगिल युद्ध पर केंद्रित कन्नौजी बोली का एक देशगीत प्रस्तुत किया ।प्राध्यापक सुभाष शर्मा ने प्रवास पर आधारित कन्नौजी बोली की अपनी स्वरचित कविता का पाठ किया तथा नरेश द्विवेदी ने कन्नौजी लोक गीत “गांव की मेहरिया” का पाठ किया। संगोष्ठी में मुख्य अतिथि में उपस्थित पूर्व संयुक्त निदेशक सूचना विभाग व संपादक कला वसुधा अशोक बैनर्जी ने मैकाले की शिक्षा नीति की विसंगतियों पर बात करते हुए लोक बोली की महत्ता पर बात की तथा सभी भाषा के लोगों को मिलकर भाषा और बोलियों पर काम की आवश्यकता को रेखांकित किया। कार्यक्रम का सफल संचालन लोक साहित्यकार डॉ. प्रखर दीक्षित ने किया।संगोष्ठी में वंदना, ज्योति किरण, सीपी मिश्रा की भी उपस्थिति बनी रही।


