फर्रुखाबाद| पांचाल घाट स्थित गंगा तट पर माघ मास के दौरान 3 जनवरी से 3 फरवरी तक चला मेला रामनगरिया मंगलवार को माघ पूर्णिमा के अवसर पर विधिवत रूप से संपन्न हो गया। एक माह तक चले कल्पवास का संकल्प पूरा होते ही गंगा तट पर श्रद्धा, भक्ति और भावुकता का अद्भुत संगम देखने को मिला। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में हजारों कल्पवासियों ने मां भागीरथी में अंतिम पुण्य स्नान किया और विधिवत पूजन-अर्चन, आरती व मंत्रोच्चार के साथ मां गंगा से आशीर्वाद प्राप्त किया।
कल्पवासियों ने स्नान के उपरांत अगले वर्ष पुनः माघ मास में गंगा तट पर आकर कल्पवास करने का संकल्प दोहराया। इसके बाद पुण्य की गठरी और पवित्र गंगा जल अपने साथ लेकर नम आंखों से अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान किया। माघ पूर्णिमा के दिन विदाई का यह दृश्य अत्यंत भावुक रहा, कई श्रद्धालु मां गंगा से बिछोह के क्षणों में भावनाओं को रोक नहीं सके।
3 जनवरी से प्रारंभ हुआ मेला रामनगरिया पूरे एक माह तक आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बना रहा। इस दौरान गंगा तट पर तंबुओं का एक विशाल नगर बस गया था, जहां दूर-दराज के जनपदों और अन्य राज्यों से आए हजारों श्रद्धालु कल्पवास कर रहे थे। कल्पवासियों ने संयमित और सात्विक जीवन अपनाते हुए नियमित गंगा स्नान, जप-तप, ध्यान, दान-पुण्य और सत्संग के माध्यम से आध्यात्मिक साधना की। संत-महात्माओं के प्रवचन, कथा और भजन-कीर्तन से गंगा तट का वातावरण पूरे माह भक्तिमय बना रहा।
कल्पवासियों का कहना था कि माघ मास में मां गंगा की गोद में बिताया गया यह समय उनके जीवन की सबसे बड़ी तपस्या और साधना रहा। इस एक माह ने उन्हें आत्मचिंतन, संयम और सकारात्मक जीवन मूल्यों की ओर प्रेरित किया। श्रद्धालुओं ने गंगा जल को कलशों, बोतलों और तांबे के पात्रों में भरकर अपने साथ लिया, जिसका उपयोग वे घरों में पूजन, हवन और धार्मिक अनुष्ठानों में करेंगे। कल्पवास से अर्जित पुण्य को उन्होंने परिवार की सुख-शांति और समृद्धि का आधार बताया।
मेला रामनगरिया के समाप्त होते ही गंगा तट पर बसा तंबुओं का शहर सिमटने लगा। जहां कुछ दिन पहले तक मिनी कुंभ जैसा नजारा था, वहां अब धीरे-धीरे शांति और सूनापन छा गया है। प्रशासन की ओर से साफ-सफाई और अस्थायी व्यवस्थाओं को हटाने का कार्य शुरू कर दिया गया है। एक माह तक चली इस पावन परंपरा के समापन के साथ ही गंगा तट ने फिर से अपनी शांत और गंभीर छवि धारण कर ली है, लेकिन श्रद्धालुओं के मन में मेला रामनगरिया और कल्पवास की स्मृतियां लंबे समय तक जीवित रहेंगी।






