मिशन अस्पताल के पास फुटपाथ दुकानदारों से कथित अवैध वसूली का आरोप
 एक ने इंकार किया तो धमकी

फर्रुखाबाद।आवास विकास चौकी क्षेत्र में कानून की हकीकत और ज़मीन पर उसका चेहरा एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मिशन अस्पताल के पास, चौकी के ठीक सामने फुटपाथ के दोनों ओर करीब एक सैकड़ा से अधिक अस्थायी दुकानें धड़ल्ले से संचालित हो रही हैं, लेकिन इन्हीं दुकानों के बीच अब कथित पुलिस वसूली और धमकी का गंभीर मामला सामने आया है।
स्थानीय दुकानदारों के अनुसार यहां
पांच डोसे की दुकानें, तीस फास्ट फूड की दुकानें, छह नॉनवेज की दुकानें, दस भुने आलू की दुकानें, बीस सिगरेट-मसाला की दुकानें, पांच गमलों की दुकानें, छह मच्छरदानी की दुकानें, दो नारियल, तीन मूंगफली, तीन गोलगप्पे, दस चाय-कॉफी की दुकानें प्रतिदिन लगती हैं। खास बात यह कि भुने आलू की दुकानों पर शराबियों का जमावड़ा भी होता है, जिससे आम राहगीरों और मरीजों को असुविधा होती है।
वसूली से इंकार किया तो धमकी!
पीड़ित दुकानदार का आरोप है कि जब उसने पुलिस की कथित अवैध वसूली में शामिल होने से इंकार किया, तो चौकी प्रभारी ने उसे डीएम की लिखित अनुमति दिखाने को कहा। दुकानदार के अनुसार, अनुमति न होने का बहाना बनाकर उसका सामान भरवाने, दुकान हटवाने और झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी गई।
दुकानदार का दावा है कि आसपास की कई दुकानों से नियमित रूप से पैसा लिया जाता है, लेकिन जो इस “व्यवस्था” में शामिल नहीं होते, उन्हें निशाना बनाया जाता है।
इस कथित कार्रवाई के बाद फुटपाथ दुकानदारों में भय और रोष दोनों है। दुकानदारों का कहना है कि वे गरीब और मेहनतकश लोग हैं, जिनका रोज़गार इन्हीं छोटी दुकानों से चलता है। ऐसे में दबाव बनाकर अवैध वसूली करना कानून के साथ-साथ मानवता के भी खिलाफ है।
मामले पर जब चौकी प्रभारी से सवाल किए गए तो उन्होंने धन वसूली के आरोपों को सिरे से खारिज किया। उनका कहना था कि “जो दुकानें पहले से लगी हैं, उन्हें ही लगने दिया जाएगा। नई दुकान लगाने के लिए डीएम की लिखित अनुमति आवश्यक है।”
लेकिन जब उनसे पूछा गया कि कितनी दुकानें पुरानी हैं?
क्या कोई लिखित रिकॉर्ड या सूची मौजूद है?
तो वे इन सवालों से बचते नजर आए।
यहां सबसे अहम सवाल यह है कि फुटपाथ दुकानों की अनुमति देने का अधिकार नगर पालिका का होता है, न कि जिलाधिकारी का।
तो फिर डीएम की अनुमति का हवाला क्यों?
क्या यह नियमों की आड़ में दबाव बनाने का तरीका है?
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
चौकी के ठीक सामने सैकड़ों दुकानें वर्षों से लगी हों और अचानक अनुमति का फरमान जारी हो जाना, पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है। अगर दुकानें अवैध हैं तो वर्षों से क्यों चलने दी गईं? और अगर वैध हैं, तो एक दुकानदार को ही क्यों निशाना बनाया गया?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर सच्चाई सामने लाता है या फिर फुटपाथ दुकानदारों का डर यूं ही कायम रहेगा।

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