शरद कटियार
प्रयागराज (Prayagraj) में कोडीन कफ सिरप सिंडिकेट (Codeine cough syrup syndicate) से जुड़े मामलों पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ताज़ा अंतरिम आदेश एक बार फिर न्यायिक विवेक, न्याय तक समता से पहुँच और जनमानस के विश्वास को केंद्र में खड़ा कर देता है। अदालत ने 15 दिसंबर तक गिरफ्तारी पर रोक लगाकर याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान की है। यह आदेश न्यायिक प्रक्रिया का अंग है, पर इसी के साथ कई अहम प्रश्न भी समाज के सामने खड़े होते हैं।
उच्च न्यायालय का यह आदेश इसलिए चर्चा में है क्योंकि बीते कुछ वर्षों में कई ऐसे मुकदमे सामने आए हैं, जिनमें आरोपी वर्षों तक फरार या कथित रूप से गम्भीर आपराधिक गतिविधियों से जुड़े रहे, राज्य स्तर पर उनके विरुद्ध कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई, यह बात निर्विवाद है कि न्यायालय कानून के अनुसार निर्णय देता है, और प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष न्याय पाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि वही प्रक्रिया आम नागरिकों के लिए वर्षों तक लंबित रहती है, जबकि प्रभावी, संसाधन-संपन्न या वीवीआईपी वकीलों द्वारा दायर याचिकाएँ कई बार प्राथमिकता पर सूचीबद्ध हो जाती हैं।
यह प्रश्न इसलिए और तीखा होता है क्योंकि कई पीड़ितों के मामलों में सुनवाई की तारीख पाने में ही महीने और वर्ष लग जाते हैं, जबकि कुछ आरोपी बहुत कम समय में अंतरिम राहत, स्थगन आदेश या गिरफ्तारी पर रोक प्राप्त कर लेते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद–14 में समानता का अधिकार स्पष्ट रूप से निहित है।
परंतु समाज में यह भावना गहराती जा रही है कि
“जहाँ गरीब पीड़ित महीनों न्याय की प्रतीक्षा में बैठा रहता है, वहीं प्रभावशाली व्यक्ति अपनी याचिका तत्काल सूचीबद्ध करा लेता है।”
न्यायपालिका पर कटाक्ष नहीं—परंतु न्याय की गति और प्राथमिकता पर जनता सवाल अवश्य उठा रही है। यही लोकतंत्र की शक्ति भी है। पिछले समय में ऐसे कई प्रकरण सामने आए जहाँ गंभीर आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को तत्काल सुनवाई और राहत मिली,जबकि पीड़ितों की अर्जी वर्षों तक पेंडिंग रहीं, बड़ी आर्थिक अनियमितताओं व संपत्ति विवादों में भी कई बार आरोपी को शीघ्र संरक्षण मिल गया, वहीं आम नागरिक को अपने ही अधिकार सिद्ध करने में लंबा संघर्ष करना पड़ा।
ऐसे उदाहरण जनमानस के मन में यह प्रश्न पैदा करते हैं कि क्या न्याय का दरवाज़ा सबके लिए समान गति से खुलता है? न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान, पर सुधार की आवश्यकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि न्यायालय अपनी स्वतंत्रता और विवेक से काम करता है, हर व्यक्ति को राहत मांगने का अधिकार है,और अदालत का अंतरिम आदेश किसी आरोपी को निर्दोष नहीं ठहराता। परंतु जब ऐसे आदेश लगातार “सामर्थ्यवान” व्यक्तियों के पक्ष में अधिक दिखाई दें, तो न्याय की धारणा पर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है।
भारत का लोकतंत्र और न्यायपालिका विश्व में विशिष्ट स्थान रखते हैं।किन्तु न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति, तारीख़ों का बोझ, और प्राथमिकता में असमानता ऐसी चुनौतियाँ हैं जिन्हें स्वीकार करना होगा। यदि पीड़ित न्याय के लिए वर्षों भटके, और आरोपी त्वरित राहत पा जाएँ—तो न्याय की भावना कमजोर पड़ती है डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान में जो समानता और न्याय की परिकल्पना की थी, आज उसका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक प्रतीत होता है— ताकि न्याय केवल दिया ही न जाए, बल्कि दिया हुआ दिखे भी।


