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Friday, January 16, 2026

संविधान की कसौटी पर न्यायपालिका और संसद

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शरद कटियार

जस्टिस यशवंत वर्मा प्रकरण: सुप्रीम कोर्ट का फैसला और संवैधानिक संतुलन

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका खारिज किया जाना केवल एक व्यक्ति विशेष से जुड़ा निर्णय नहीं है, बल्कि यह संविधान (Constitution), संसद और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के संतुलन को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण फैसला है। इस निर्णय ने यह संदेश दिया है कि न्यायिक स्वतंत्रता के साथ-साथ संवैधानिक उत्तरदायित्व भी उतना ही अनिवार्य है।

शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि महाभियोग जैसी संवैधानिक प्रक्रिया में न्यायपालिका का हस्तक्षेप सीमित दायरे में ही हो सकता है। यह टिप्पणी उस धारणा को मजबूती देती है कि संविधान ने हर संस्था की भूमिका स्पष्ट रूप से तय कर रखी है और किसी भी संस्था को दूसरी के अधिकार क्षेत्र में अनावश्यक दखल नहीं देना चाहिए।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ—न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा—ने यह स्पष्ट किया कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार करना और भ्रष्टाचार जांच के लिए पैनल का गठन पूरी तरह संवैधानिक दायरे में है। अदालत ने राज्यसभा के उपसभापति की भूमिका को भी वैध ठहराते हुए कहा कि सभापति की अनुपस्थिति में उन्हें कार्य करने का पूर्ण अधिकार है।

यह टिप्पणी केवल तकनीकी व्याख्या नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसे की पुनर्पुष्टि है। ठीक उसी तरह जैसे राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति कार्यभार संभालते हैं, वैसे ही संसद के भीतर भी अधिकारों की स्पष्ट श्रेणी निर्धारित है।

न्यायिक स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही

जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका का केंद्रीय तर्क यह था कि महाभियोग की प्रक्रिया न्यायिक स्वतंत्रता पर आघात करती है। लेकिन यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ पूर्ण प्रतिरक्षा हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसी प्रश्न का संतुलित उत्तर देता है—न्यायपालिका स्वतंत्र है, लेकिन संविधान से ऊपर नहीं।
महाभियोग की प्रक्रिया अपने आप में इतनी कठोर और बहुस्तरीय है कि उसका दुरुपयोग आसान नहीं। ऐसे में यदि प्रथम दृष्टया आरोपों की जांच के लिए संवैधानिक पैनल गठित होता है, तो उसे न्यायिक स्वतंत्रता के खिलाफ साजिश कहना उचित नहीं ठहराया जा सकता।

इस फैसले का एक बड़ा संदेश यह भी है कि संसद और उसके पदाधिकारियों की संवैधानिक भूमिका में न्यायालय कहां तक हस्तक्षेप कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक प्रक्रिया चल रही हो, तो अदालतें उसे बाधित नहीं करेंगी, जब तक उसमें स्पष्ट असंवैधानिकता न हो।

यह रुख लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, क्योंकि यदि हर संवैधानिक कदम को न्यायालय में चुनौती देकर रोक दिया जाए, तो शासन व्यवस्था ठप हो सकती है। जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका खारिज होना भले ही व्यक्तिगत स्तर पर उनके लिए झटका हो, लेकिन संस्थागत स्तर पर यह फैसला संविधान की मजबूती का प्रतीक है। यह निर्णय बताता है कि भारत का लोकतंत्र केवल व्यक्तियों पर नहीं, बल्कि संस्थाओं की जवाबदेही और संतुलन पर टिका है।

आज के समय में, जब हर संस्था पर सवाल उठते हैं, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक स्पष्ट संदेश देता है— न्यायपालिका स्वतंत्र है, संसद सर्वोच्च है और संविधान सर्वोपरि।

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