जयपुर। राजस्थान की राजधानी जयपुर के सवाई मानसिंह (एसएमएस) अस्पताल में रविवार देर रात बड़ा हादसा हो गया। अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर की न्यूरो आईसीयू में शॉर्ट सर्किट से लगी भीषण आग ने अफरातफरी मचा दी। आग इतनी तेजी से फैली कि आईसीयू में भर्ती आठ मरीजों की मौत हो गई, जबकि पांच मरीज गंभीर रूप से झुलस गए। देर रात को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा खुद अस्पताल पहुंचे और अधिकारियों से पूरे मामले की जानकारी ली। उन्होंने हादसे की जांच के आदेश दिए हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों और मरीजों के परिजनों के बयान अस्पताल प्रशासन की बड़ी लापरवाही को उजागर करते हैं। भरतपुर निवासी श्रीनाथ के रिश्तेदार शेरू ने बताया कि जब आग लगी, तब स्टाफ ने कोई मदद नहीं की। उन्होंने कहा कि “हमने समय रहते स्टाफ को सूचना दी, लेकिन 20 मिनट तक किसी ने कोई एक्शन नहीं लिया। जब प्लास्टिक की पाइपें पिघलकर गिरने लगीं, तब वहां मौजूद कर्मचारी मरीजों को छोड़कर खुद भाग निकले।”
पूरन सिंह, जिनका एक परिजन आईसीयू में भर्ती था, ने बताया कि “जब शॉर्ट सर्किट से चिंगारी निकली तो पास ही सिलेंडर रखा था। देखते ही देखते धुआं पूरे वार्ड में फैल गया। कई लोग अपने मरीजों को निकालने में सफल रहे, लेकिन मेरा मरीज अंदर ही रह गया। जैसे-जैसे गैस फैली, गेट बंद कर दिए गए।”
एक अन्य परिजन नरेंद्र सिंह ने बताया कि “हमें शुरुआत में आईसीयू में आग लगने की जानकारी ही नहीं दी गई। नीचे खाना खाने आया था, तब पता चला कि ऊपर आग लग गई है। वहां आग बुझाने के उपकरण तक मौजूद नहीं थे। मेरी मां अंदर थीं, लेकिन किसी ने मदद नहीं की।”
ओमप्रकाश, जिनके 25 वर्षीय मामा के बेटे की मौत इस हादसे में हुई, ने बताया कि “रात करीब 11:20 बजे जब धुआं फैलना शुरू हुआ, तो मैंने डॉक्टरों को चेतावनी दी थी, लेकिन डॉक्टर और कंपाउंडर वहां से भाग निकले। केवल चार से पांच मरीजों को ही बाहर निकाला जा सका।”
परिजनों के अनुसार, आग ट्रॉमा सेंटर की पहली मंजिल पर बने स्टोर रूम से शुरू हुई। वहां रखे पुराने रिकॉर्ड्स और फाइलों में शॉर्ट सर्किट के बाद आग लग गई, जो धीरे-धीरे आईसीयू तक पहुंच गई। जैसे ही धुआं बढ़ा, स्टाफ ने बिजली बंद कर दी और मरीजों को अंधेरे में छोड़ दिया।
दमकल विभाग को सूचना मिलने के बाद छोटी गाड़ियां मौके पर पहुंचीं, लेकिन आग ऊपरी मंजिल पर थी, जिससे पानी ऊपर तक नहीं पहुंच पाया। बाद में स्नार्कल लैडर मशीन बुलाई गई, लेकिन ट्रॉमा सेंटर का गेट छोटा होने के कारण वह अस्पताल परिसर में नहीं घुस सकी। इससे आग पर काबू पाने में काफी देरी हुई।
अस्पताल के अंदर फायर सेफ्टी सिस्टम का भी अभाव पाया गया। हादसे के बाद यह साफ हो गया कि ट्रॉमा सेंटर में आग बुझाने के पर्याप्त संसाधन नहीं थे। यदि आईसीयू के पास फायर फाइटिंग सिस्टम या स्मोक डिटेक्टर होते, तो आग फैलने से पहले ही काबू पाया जा सकता था।
मरने वालों में तीन महिलाएं भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने इस दर्दनाक घटना पर गहरा शोक व्यक्त किया है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी पीड़ितों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई और हादसे की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
जयपुर जैसे बड़े शहर के सबसे प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल में यह हादसा सुरक्षा और लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अस्पताल प्रशासन की अनदेखी और फायर सेफ्टी सिस्टम की कमी ने आठ मरीजों की जान ले ली, जबकि कई परिवारों को आजीवन दर्द दे गया।






