9 C
Lucknow
Wednesday, January 14, 2026

जब तमाम विधायकों को अपना प्रोटोकॉल ही नहीं पता,तो नौकरशाही का अहंकार बढ़ना लाजमी

Must read

शरद कटियार
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा विधानसभा और संसद हैं। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर सदन तक भेजती है, ताकि वे न केवल कानून बना सकें बल्कि शासन-प्रशासन पर निगरानी भी रख सकें। परंतु विडम्बना यह है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे में कई विधायक अपने ही संवैधानिक प्रोटोकॉल और शक्तियों को सही ढंग से जानते तक नहीं।
विधायक की संवैधानिक हैसियत बहुत स्पष्ट है – वह न तो केवल जनता का नुमाइंदा है, बल्कि सरकार की रीढ़ और नीतिगत दिशा-निर्देशक भी है। नौकरशाही, चाहे वह मुख्य सचिव हो या डीजीपी, जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि के समकक्ष या उससे ऊपर नहीं है। भारतीय संविधान ने सत्ता-संतुलन के जिस ढांचे को बनाया है, उसमें विधायिका सर्वोच्च है, कार्यपालिका उसकी अधीन। परंतु दुर्भाग्य से अनेक विधायक अपने अधिकारों का सही ज्ञान न रखते हुए मात्र जिलास्तरीय अफसरों – डीएम या एसपी – से “साहब” कहकर संतुष्ट हो जाते हैं।
समस्या यहीं से शुरू होती है। जब विधायक स्वयं ही अफसर को अपना ‘साहब’ कहने लगते हैं, तब वह अफसर यह मान बैठता है कि जनता की निगरानी और उसकी आवाज गौण है। नतीजतन नौकरशाही में अहंकार पनपता है और फिर वही अफसर जनता, मीडिया, यहाँ तक कि न्यायपालिका के साथ भी हल्केपन का व्यवहार करने लगता है। यह लोकतंत्र के मूल ढांचे पर कुठाराघात है।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 168 से लेकर 212 तक विधायिका की भूमिका को स्पष्ट करते हैं। विधायक का दर्जा केवल एक जिले या क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि राज्य शासन-प्रशासन की दिशा तय करने तक है।
मुख्य सचिव, डीजीपी या कोई भी आईएएस,आईपीएस अधिकारी विधायिका से ऊपर नहीं हैं।
अफसर का काम नीति-निर्माण नहीं बल्कि नीति-कार्यान्वयन है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्राथमिक जिम्मेदारी विधायकों और मंत्रियों की है, न कि प्रशासनिक अधिकारियों की।
इतिहास गवाह है कि जब विधायिका ने अपनी गरिमा को मजबूती से कायम रखा, नौकरशाही ने भी जनता की सेवा में ईमानदारी दिखाई।
पंडित जवाहरलाल नेहरू अक्सर कहते थे कि अफसर नीति नहीं बनाएंगे, वे केवल जनता के चुने प्रतिनिधियों की नीति को क्रियान्वित करेंगे।
डॉ. राममनोहर लोहिया ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में कई बार जोर देकर कहा कि “जनता के वोट से आने वाला प्रतिनिधि ही सर्वोच्च है, अफसर नहीं।”
1977 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के सत्र के दौरान, तत्कालीन विपक्ष के नेता ने नौकरशाही के रवैये पर कटाक्ष करते हुए कहा था – “यह सदन यदि चाहे तो मुख्य सचिव को भी बुलाकर कठघरे में खड़ा कर सकता है।” यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधायकों की हैसियत और जिम्मेदारी दोनों को दर्शाता है।
ब्रिटेन के संसदीय इतिहास में भी अफसरशाही को “civil servant” यानी जनता का सेवक ही कहा गया, जबकि वहां भी निर्णय करने का अधिकार केवल चुने हुए सांसदों के पास रहा।
जनता ने विधायक को सीधे चुना है, जबकि अधिकारी केवल नियुक्त हैं। ऐसे में जनता के प्रति प्रत्यक्ष जवाबदेही निर्वाचित प्रतिनिधि की होती है। यदि विधायक ही अपने प्रोटोकॉल और अधिकारों की उपेक्षा करेंगे, तो जनता की आवाज नौकरशाही की कठोर दीवारों में गुम हो जाएगी।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए केवल समस्या की पहचान ही नहीं, बल्कि समाधान भी आवश्यक है।
प्रत्येक नए निर्वाचित विधायक को विधानसभा सचिवालय द्वारा संवैधानिक अधिकारों और प्रोटोकॉल पर विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। प्रोटोकॉल मैनुअल का पालन करने के लिए विधायकों और अफसरों दोनों को एक समान प्रोटोकॉल पुस्तिका दी जाए, जिसमें स्पष्ट उल्लेख हो कि कौन किसके अधीन है।विधानसभा निगरानी समितियाँ – हर जिले में ऐसी समिति बने जो यह देखे कि अफसर जनता के चुने प्रतिनिधियों का सम्मान कर रहे हैं या नहीं।जन-जागरूकता अभियान से जनता को भी बताया जाए कि उनके प्रतिनिधि अफसर से ऊपर हैं, ताकि वे अपने विधायक पर दबाव डाल सकें कि वह नौकरशाही के सामने झुके नहीं। दंडात्मक प्रावधान मे यदि कोई अधिकारी विधायक के अधिकार या गरिमा की अवहेलना करता है तो उसके खिलाफ विधानसभा विशेषाधिकार समिति में कार्रवाई कर सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विधायक अपने संवैधानिक अधिकारों और जिम्मेदारियों को पहचानें। उन्हें नौकरशाही के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार तो करना चाहिए, परंतु “साहब” कहकर उनकी मानसिकता को जनता से ऊपर नहीं उठाना चाहिए। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब विधायिका अपनी गरिमा बनाए रखे और कार्यपालिका अपनी सीमा में रहकर जनता की सेवा करे।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article