लखनऊ| सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) का दायरा और उद्देश्य स्पष्ट करते हुए सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम ने कहा है कि आरटीआई का उपयोग किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी में दखल देने या निजी मुकदमों के लिए साक्ष्य जुटाने के माध्यम के रूप में नहीं किया जा सकता। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह कानून पारदर्शिता और जनहित के लिए है, न कि व्यक्तिगत विवादों को मजबूत करने के लिए। इसी आधार पर बिजनौर से जुड़ी एक अपील को खारिज कर दिया गया है।
सूचना आयोग के अनुसार बिजनौर जिले के एक अपीलकर्ता ने नजीबाबाद तहसीलदार कार्यालय में आरटीआई आवेदन दाखिल कर अपने ससुर से संबंधित वित्तीय जानकारी मांगी थी। इसमें वेतन विवरण, सामान्य भविष्य निधि (जीपीएफ), लिए गए ऋण तथा चल-अचल संपत्तियों की पूरी जानकारी शामिल थी। संबंधित व्यक्ति तहसील में राजस्व निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे।
अपीलकर्ता का तर्क था कि उसकी पत्नी ने उसके और उसके परिवार पर 26 लाख रुपये दहेज लेने का आरोप लगाया है। ऐसे में दहेज से जुड़े मुकदमे में यह साबित करना जरूरी है कि उसके ससुर की आर्थिक हैसियत इतनी थी या नहीं कि वह इतना दहेज दे सकें। इसी आधार पर उसने आरटीआई के जरिए यह जानकारी हासिल करने की कोशिश की।
इस मामले की सुनवाई करते हुए सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि वेतन, संपत्ति, जीपीएफ, लोन जैसी जानकारियां व्यक्तिगत श्रेणी में आती हैं और इन्हें निजी सूचना माना जाता है। जब तक ऐसा कोई बड़ा सार्वजनिक हित न हो, जो निजता के अधिकार से ऊपर हो, तब तक इस तरह की जानकारी आरटीआई के तहत उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
सूचना आयुक्त ने यह भी स्पष्ट किया कि आरटीआई कानून का इस्तेमाल पारिवारिक या वैवाहिक विवादों में सबूत इकट्ठा करने के लिए नहीं किया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति को किसी मुकदमे के लिए साक्ष्य की आवश्यकता है, तो उसके लिए न्यायालय एक उपयुक्त और वैधानिक मंच है। अदालत के पास जांच और साक्ष्य जुटाने के अपने अधिकार और प्रक्रियाएं हैं, जिनका सहारा लिया जाना चाहिए।
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि आरटीआई का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, न कि किसी कर्मचारी या व्यक्ति की निजी आर्थिक स्थिति को सार्वजनिक करना। इसी आधार पर बिजनौर के अपीलकर्ता की अपील को खारिज कर दिया गया।
इस फैसले को आरटीआई कानून और निजता के अधिकार के संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जिससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि सूचना का अधिकार असीमित नहीं है और व्यक्ति की निजी जानकारी की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है।






