नई दिल्लीl भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने वर्ष 2026 के अपने पहले अंतरिक्ष मिशन के तहत श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 260 टन वजनी पीएसएलवी-सी62 रॉकेट के माध्यम से पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ‘अन्वेषा’ सहित कुल 15 उपग्रहों के प्रक्षेपण का प्रयास किया, लेकिन प्रक्षेपण के तीसरे चरण में आई तकनीकी खराबी के कारण मिशन सफल नहीं हो सका। इसरो के अनुसार, रॉकेट के तीसरे चरण के अंतिम हिस्से में गड़बड़ी सामने आई, जिसके बाद उपग्रहों को निर्धारित कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका। पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है।
इसरो प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने बताया कि चार चरणों वाले पीएसएलवी रॉकेट के प्रक्षेपण के दौरान तीसरे चरण की समाप्ति से ठीक पहले तक सभी प्रणालियां सामान्य रूप से काम कर रही थीं, लेकिन इसके बाद कुछ असामान्य स्थितियां देखी गईं। इसी कारण रॉकेट अपने तय मार्ग से भटक गया। उन्होंने कहा कि तकनीकी कारणों की गहन समीक्षा की जा रही है ताकि आगे के अभियानों में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति न हो।
यह मिशन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा था क्योंकि इसका प्रमुख उपग्रह ‘अन्वेषा’ देश की सुरक्षा और निगरानी क्षमताओं को मजबूत करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा तैयार यह उन्नत पृथ्वी अवलोकन उपग्रह पृथ्वी से लगभग 600 किलोमीटर ऊपर सूर्य-संक्रमणशील ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया जाना था। इसे भारत की निगरानी प्रणाली की बड़ी कड़ी माना जा रहा है और इसे देश का “आंखों वाला प्रहरी” भी कहा जाता है।
‘अन्वेषा’ उपग्रह में अत्याधुनिक हाइपरस्पेक्ट्रल चित्रण तकनीक का उपयोग किया गया है, जो सामान्य कैमरों की तुलना में कहीं अधिक सूक्ष्म और विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराती है। यह तकनीक प्रत्येक पिक्सल में सैकड़ों प्रकाश तरंग बैंड दर्ज करती है, जिससे जंगलों, बंकरों या छिपे ठिकानों में मौजूद गतिविधियों की पहचान संभव हो पाती है। इसके जरिए आतंकियों, घुसपैठियों और उपद्रवियों पर पैनी नजर रखी जा सकती है, जिससे सुरक्षा बलों को रणनीतिक स्तर पर बड़ी सहायता मिलने की उम्मीद थी।
पीएसएलवी-सी62 मिशन में दो ठोस सहायक मोटरों वाले पीएसएलवी-डीएल संस्करण का इस्तेमाल किया गया था। यह पीएसएलवी रॉकेट की 64वीं उड़ान थी। पीएसएलवी इसरो का मुख्य प्रक्षेपण यान है, जिसने अब तक चंद्रयान-1, मंगल कक्षा मिशन, आदित्य-एल1 और एस्ट्रोसैट जैसे कई महत्वपूर्ण अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। वर्ष 2017 में इसी रॉकेट के जरिए एक साथ 104 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर विश्व रिकॉर्ड भी बनाया गया था।
हालांकि इस बार आई तकनीकी बाधा को इसरो एक अस्थायी झटका मान रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जांच के बाद कारण स्पष्ट हो जाएंगे और भविष्य के मिशन पहले से अधिक सुरक्षित और सटीक बनाए जाएंगे। ‘अन्वेषा’ जैसे उपग्रह भारत की रक्षा और निगरानी क्षमताओं को नई मजबूती देने की दिशा में अहम माने जा रहे है।

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