भारतीय राजनीति में शायद ही कोई ऐसा दशक बीता हो जिसमें सत्ता और भ्रष्टाचार का गठजोड़ सुर्खियों में न रहा हो। अब एक बार फिर बिहार की राजनीति में उबाल है — कारण है आईआरसीटीसी घोटाला, जिसमें लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव पर अदालत ने आरोप तय कर दिए हैं। अदालत का यह कदम केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के चरित्र पर उठे सवालों का जवाब भी है।
यह मामला 2004 से 2009 के बीच का है, जब लालू यादव रेल मंत्री थे। आरोप है कि उन्होंने रेल मंत्रालय का दुरुपयोग करते हुए निजी कंपनी को आईआरसीटीसी के होटल अनुचित तरीके से पट्टे पर दिए और बदले में अपने परिजनों के नाम संपत्ति हासिल की। इस पर अदालत ने भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप तय किए हैं।
अब जब अदालत ने आरोप तय कर दिए हैं, बिहार की सियासत में बयानबाज़ी का दौर शुरू हो गया है। जेडीयू और बीजेपी के नेताओं ने लालू परिवार पर जमकर निशाना साधा है — और यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि यह मुद्दा केवल एक व्यक्ति या परिवार का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का है जो सत्ता को निजी लाभ का माध्यम मानती रही है।
तेजस्वी यादव, जो खुद को युवाओं की नई राजनीति का चेहरा बताते हैं, अब एक बार फिर अपने परिवार की विरासत के बोझ तले हैं। जनता उनसे यह उम्मीद करती है कि वे पुराने ढर्रे से हटकर जवाबदेही की राजनीति करें — लेकिन सवाल यह है कि क्या वे ऐसा कर पाएंगे?
दूसरी ओर, अदालत का यह निर्णय यह संदेश भी देता है कि कानून से बड़ा कोई नहीं। चाहे वह कितना भी प्रभावशाली नेता क्यों न हो, अगर उसने जनता के विश्वास के साथ छल किया है, तो न्यायपालिका उसे जवाबदेह ठहराने में सक्षम है।
बिहार की राजनीति में इस निर्णय से निश्चित रूप से गरमाहट बढ़ी है, लेकिन इस गरमाहट में जनता के लिए एक उम्मीद भी छिपी है — कि शायद अब राजनीतिक जवाबदेही केवल भाषणों तक सीमित न रहकर अदालतों के फैसलों से भी तय होगी।
यह मुकदमा आने वाले दिनों में किस दिशा में जाएगा, यह तो समय बताएगा, पर इतना तय है कि यह प्रकरण भारतीय लोकतंत्र को एक बार फिर आईना दिखा रहा है — जिसमें सत्ता का दुरुपयोग, परिवारवाद और भ्रष्टाचार जैसे कुरूप चेहरे साफ दिखाई दे रहे हैं।






