800 से ज्यादा उद्योग संकट में, कार्टन बॉक्स-स्नैक्स और फैब्रिकेशन इकाइयों पर सबसे बड़ा असर
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में भड़के ईरान-इजराइल युद्ध का असर अब भारतीय उद्योगों तक पहुंचने लगा है। कच्चे माल की बढ़ती कीमत, समुद्री शिपिंग में बाधा और निर्यात में गिरावट के चलते देश की 800 से अधिक छोटी और मध्यम उद्योग इकाइयां (एमएसएमई ) बंदी की कगार पर पहुंच गई हैं। उद्योग संगठनों के मुताबिक यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो आने वाले समय में हजारों श्रमिकों की रोजी-रोटी पर संकट गहरा सकता है।
युद्ध के कारण खाड़ी क्षेत्र से आने वाले पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इसका सीधा असर कार्टन बॉक्स, पैकेजिंग, स्नैक्स और फैब्रिकेशन उद्योग पर पड़ा है। इन उद्योगों में उपयोग होने वाले कई रसायन और पॉलिमर मध्य-पूर्व से आयात किए जाते हैं, जिनकी कीमतें अचानक बढ़ गई हैं।
उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार
करीब 800 से ज्यादा एमएसएमई इकाइयां संकट में हैं,कई क्षेत्रों में उत्पादन 30 से 50 प्रतिशत तक घटा है।पैकेजिंग और प्लास्टिक कच्चे माल की लागत में 20 से 25 प्रतिशत तक वृद्धि हुईं है।
व्यापारिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है।
भारत का पश्चिम एशिया के साथ व्यापार काफी बड़ा है। पिछले वर्ष भारत ने इस क्षेत्र से लगभग 98 अरब डॉलर से अधिक का आयात किया था। युद्ध के कारण समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ने से शिपिंग और बीमा लागत तेजी से बढ़ रही है, जिससे निर्यातकों की लागत भी बढ़ गई है।
व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि कई भारतीय कंपनियों को नए ऑर्डर लेने से पहले जोखिम का आकलन करना पड़ रहा है, जिससे उत्पादन और व्यापार दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
रोजगार पर भी मंडरा रहा खतरा
छोटे उद्योगों के संगठन का कहना है कि यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो हजारों श्रमिकों की नौकरियों पर खतरा पैदा हो सकता है। पैकेजिंग, खाद्य प्रसंस्करण और इंजीनियरिंग इकाइयों में पहले ही उत्पादन घटाया जा चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है तो भारत के छोटे उद्योगों और निर्यात कारोबार पर इसका गंभीर आर्थिक असर पड़ सकता है।






