12 C
Lucknow
Friday, January 30, 2026

भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते से बदली दक्षिण एशिया की आर्थिक तस्वीर, पाकिस्तान में बढ़ी कारोबारी चिंता

Must read

 

भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) ने दक्षिण एशिया में आर्थिक समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। इस समझौते को भारत के लिए जहां निर्यात, निवेश और वैश्विक व्यापार में मजबूती के बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है, वहीं पाकिस्तान के कारोबारी और वित्तीय हलकों में इसे लेकर गहरी चिंता उभर कर सामने आई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-ईयू एफटीए से भारतीय उत्पादों को यूरोपीय बाजार में बड़ी बढ़त मिलेगी, जिसका सीधा असर पाकिस्तान के निर्यात पर पड़ सकता है। खासतौर पर टेक्सटाइल सेक्टर, जो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, इस समझौते से सबसे अधिक प्रभावित हो सकता है।

समझौते के तहत 27 देशों वाले यूरोपीय संघ में भारत के करीब 93 प्रतिशत निर्यात को शुल्क-मुक्त पहुंच मिलने जा रही है। इसका मतलब है कि भारतीय उत्पाद अब यूरोप में कम कीमत पर उपलब्ध होंगे और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता काफी बढ़ जाएगी। इसके साथ ही ईयू से भारत में लग्जरी कारों, वाइन और अन्य उत्पादों का आयात भी सस्ता होगा, जिससे द्विपक्षीय व्यापार को और गति मिलेगी।

पाकिस्तान के आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि इस करार से यूरोपीय बाजार में भारतीय कंपनियां आक्रामक रणनीति के साथ उतरेंगी। इसका सीधा नुकसान पाकिस्तान जैसे देशों को होगा, जिनका बड़ा हिस्सा ईयू को होने वाले निर्यात पर निर्भर है। खासकर कपड़ा उद्योग में भारत और पाकिस्तान के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा मानी जाती है।

पाकिस्तान के वित्तीय विशेषज्ञ मुहम्मद अली साया ने इस समझौते को “नई आर्थिक लड़ाई” करार दिया है। उनका कहना है कि भारत ने रणनीतिक रूप से यूरोप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है और पाकिस्तान को अब कहीं ज्यादा कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि भारत को शून्य शुल्क का लाभ मिलने से पाकिस्तान की टेक्सटाइल इंडस्ट्री दबाव में आ सकती है।

पाकिस्तान को वर्ष 2014 में यूरोपीय संघ से जीएसपी+ का दर्जा मिला था, जिससे उसके टेक्सटाइल निर्यात में 108 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। लेकिन यह दर्जा दिसंबर अगले वर्ष समाप्त होने वाला है। विश्लेषक अली शान का कहना है कि भारत-ईयू समझौते के बाद पाकिस्तान की यह अस्थायी बढ़त भी खत्म हो सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत-ईयू एफटीए का असर केवल टेक्सटाइल तक सीमित नहीं रहेगा। चावल, कपास और अन्य कृषि आधारित निर्यात भी प्रभावित हो सकते हैं। भारतीय उत्पादों के सस्ते होने से यूरोपीय खरीदार पाकिस्तान की बजाय भारत की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे पाकिस्तान के रोजगार और निर्यात मार्जिन पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

पाकिस्तानी उद्योग जगत का मानना है कि एक बार यूरोपीय बाजार में हिस्सेदारी घटने के बाद उसे दोबारा हासिल करना बेहद मुश्किल होता है। यही कारण है कि कारोबारी संगठनों में इस समझौते को लेकर बेचैनी साफ देखी जा रही है और सरकार पर दबाव बढ़ रहा है।

इस बीच पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह संभावित नुकसान से निपटने के लिए यूरोपीय संघ के साथ संपर्क में है। वहीं, बिजनेसमैन पैनल प्रोग्रेसिव के अध्यक्ष साकिब फैयाज मागून ने सरकार से निर्यातकों को अतिरिक्त प्रोत्साहन देने की मांग की है। उन्होंने बताया कि ईयू पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है, जहां कुल निर्यात का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा जाता है।

होजरी मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के प्रमुख फैसल अरशद का कहना है कि भारत-ईयू एफटीए के बाद भारतीय निर्यातक बेहद आक्रामक कीमतों पर बाजार में उतर सकते हैं। इससे पाकिस्तान की हिस्सेदारी और कमजोर होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान ने समय रहते टैक्स में राहत, सस्ती ऊर्जा और निर्यात प्रक्रियाओं को सरल करने जैसे सुधार नहीं किए, तो उसके लिए यूरोपीय बाजार में टिके रहना आने वाले समय में बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article