हेग में PCA की कार्यवाही से भारत सतर्क, पाकिस्तान को राहत की आशंका
अनुराग तिवारी
नई दिल्ली : भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 से लागू सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty – IWT) अब एक बड़े अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवाद के केंद्र में आ गई है। नीदरलैंड के हेग स्थित Permanent Court of Arbitration (PCA) में चल रही कार्यवाही ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है। भारत जहां इस पूरी प्रक्रिया का लगातार बहिष्कार कर रहा है, वहीं पाकिस्तान इसे अपने पक्ष में कानूनी बढ़त के रूप में देख रहा है।
दरअसल, PCA ने हाल ही में 12 मार्च और 21 मार्च को दो महत्वपूर्ण आदेश जारी किए हैं और अब यह अदालत पाकिस्तान की अपील पर अंतरिम राहत देने तथा भारत द्वारा सिंधु जल संधि को “निलंबित” किए जाने की कानूनी वैधता पर विचार कर रही है। यही स्थिति भारत के लिए चिंता का कारण बनी हुई है, क्योंकि उसे आशंका है कि अदालत एकतरफा रुख अपना सकती है।
सिंधु जल संधि, जो वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच हुई थी, जल बंटवारे की एक ऐतिहासिक व्यवस्था है। इसके तहत पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलुज—पर भारत का पूर्ण अधिकार है, जबकि पश्चिमी नदियां—इंडस, झेलम और चेनाब—मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए आरक्षित हैं, हालांकि भारत को सीमित उपयोग, विशेषकर जलविद्युत उत्पादन की अनुमति दी गई है।
विवाद की जड़ भारत की किशनगंगा और राटले जलविद्युत परियोजनाएं हैं, जिन पर पाकिस्तान का आरोप है कि ये परियोजनाएं पश्चिमी नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं। वहीं भारत का कहना है कि ये सभी परियोजनाएं संधि के प्रावधानों के अनुरूप हैं और “रन-ऑफ-द-रिवर” तकनीक पर आधारित हैं, जिससे पानी का स्थायी भंडारण नहीं होता। भारत ने PCA की कार्यवाही को पूरी तरह गैर-कानूनी बताते हुए यह स्पष्ट किया है कि संधि में विवाद समाधान के लिए पहले “न्यूट्रल एक्सपर्ट” की प्रक्रिया निर्धारित है, जिसे दरकिनार कर सीधे मध्यस्थता शुरू करना नियमों का उल्लंघन है। इसी कारण भारत इस प्रक्रिया में भाग नहीं ले रहा है और इसे मान्यता देने से भी इनकार कर चुका है।
साथ ही, भारत ने यूनाइटेड नेशन समेत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह भी दोहराया है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक सिंधु जल संधि को निलंबित रखा जाएगा।
दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए PCA से मांग की है कि भारत की परियोजनाओं पर रोक लगाई जाए और संधि के तहत उसके अधिकारों की रक्षा के लिए तत्काल अंतरिम राहत दी जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद अब केवल भारत-पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक जल संधियों और अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता पर भी पड़ सकता है। यदि PCA एकतरफा फैसला देता है और भारत उसे मानने से इनकार करता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकता है।
फिलहाल, सभी की निगाहें PCA के आगामी फैसले पर टिकी हैं। यह फैसला न केवल सिंधु जल संधि के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि दक्षिण एशिया की कूटनीतिक और सामरिक स्थिति पर भी गहरा असर डाल सकता है।


